प्रकाशक-- सन्मति-ज्ञान-पीठ, लोहामंडी, आगरा

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प्रथम चार १५०० द्सिम्धर १६४४ .. मूल्य तीन रुपये

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मुद्क--' विजय आदे प्रेस, नौवस्ता, आगरा

विचार-दर्शन सनुष्य क्या है ?

भारत के महापुरुषों, ऋषि-मुनियों, आचायों और घर्म-शास्त्रों ने एक स्वर से मनुष्य की गोरव-गाया का गान किया है | मनुष्य की मद्दिमा श्राखिर किस कारण है? मनुष्य में ऐसी क्या विशेषता है ! किस कारण से चह स्पृहणीय समभा जाता है! क्या इस सप्त धातुओं के वने शरीर फे कारण मनोरम इन्द्रियों के कारण मिद्दे के श्स ढेर के कारण ! उत्तर में एक बार नहीं, हजार बार नकार' कहना होगा | मनुष्य का शरीर पाकर भी जिसने मनुष्य क्ा-्सा जीवन नहीं पाया, उसने कुछ नहीं पाया। और जिसने मानव-तन के साथ मानव-जीवन मी पाया, वह कृतकार्य हो गया |

इसका श्रर्थ यह हुआ कि मनुष्य केवल मरणघर्मा हाड-मांस का पुतला नहीं है | वह इससे वहुत बड़ी वत्सु है। मनुष्य जितना बड़ा हैं, उतना ही बढ़ा उसका व्यक्तित्व है और उतना ही बढ़ा उसका दृष्टि-कोण ? अध्यात्मिक उत्कप की जितनी भी साधनाएँ हैं, उन सब का लोत मनुष्य की शोर ही प्रवाहित होता है। सत्य, श्रहिंसा, दया, रुणा, छमा और कर्तव्य की जो मो भूमिकाएँ हं, उन सबका उदय तथा परिपाक इसी जीवन में संभव है। अ्रतः मनुष्य की परिमाषा है--

“मननात्‌ मनुष्य? जो मनन करता है, विचार करता है, वह मनुष्य है। निर्भट- कार यार मुनि भी इसी स्वर में वोल रहे ईँ--

ले ०००» हनलमलन--+स बन+० नकल कमन--ोननन-नननी “तन की फनननन कककन+

“मत्वा कार्याणि सीव्यन्तीति मनुष्या: |? --जो विचार कर कार्य करते हैं, वे मनुष्य हूँ |

दूसरे शब्दों में, इसका श्रभिप्राय यह हुआ कि जब तक श्रत्तर्जागरण के लिए विचार अ्रंगढ़ाई नहीं लेते, मनुष्य बनकर मनुष्य के ढंग से सोच-विचार नहीं किया जाता, जीवन के प्रत्येक मोड़ पर श्रन्तर्निवेक का प्रकाश नहीं जगमगाता, क्या वंनना है, क्या करना है, जीवन को किस सांचे में ढालना है। परिवार, समाज श्रौर राष्ट्र के प्रति मेरे क्या दायित्व हैं, और उन दावित्वों फो मैं कहाँ तक सहन कर रहा हूँ! जब तक यह विचार-दिशा साफ नहीं होती; तव तक कुछ होता-जाता या वनता-बनाता नहीं है जीवन में

संक्षेप में, मनुष्य वह है; जो मननशोल है, चिन्तनशौल है, विचरशील है। जो अपने जीवन की गहराई भी नापने चे और दूसरे के जीवन की गहदराइयों को भी नापने का प्रयत्ञ करे! अपने विषय में भी विचार करे और आस-पास भें जो एक दुनिया है, समान ओर राष्ट्र है; उसके सम्बन्ध में मी विचार-चिन्तन करे | अपने जीवन के रहस्यों को भी खोजने का यत्न करे श्रौर समाज एवं राष्ट्र के जीवन-तत्त्वों की गवेपणा करने में भी तत्पर रहे। क्योंकि पशुश्रों के समान मनुष्य में केक्‍ल जीवन की प्रवृत्ति ही नहीं होती. दिमाग का मालिक होने के कारण वह लम्बा विचार भी कर सकता है। भ्रत: भारत के एंक मनौधी आचार्य ने कहा है--“श्राहार, निद्रा, भय श्रौर मैथुन--ये प्रइृत्तियाँ तो सव शरीर-घारियों में समान हैँ | मनुष्य में केवल विचार को हवी विशेषता है। विचार-हीन मनुष्य पत्ती श्रौर पशु के समान है। श्रतः मनुष्य को विचार-परायण होना चाहिए---

( रै)

“शआहारनिद्रादि सम॑ शरीरियु, वैशेष्यमेक हि नरे विचारणम्‌ तदुज्मितः पत्धि-पश्पम: सघन, तस्माद्विचारेकपरायणों मवेत्‌ |”

महापुरुषों की देन

कोई मी महापुरुष, धर्म ग्रथवा राष्ट्र का नेता समाज तथा राष्ट्र को क्या देता है? यह एक महान्‌ प्रश्न है जीवन का | जरा गहराई से विचार करने पर विदित होगा कि जीवन का कोई वना-बनाया सौदा महान्‌ पुरुषों के पास नहों होता, निछको वे पुढ़िया वाँधकर जन-जन को देते चले जायें | मनुष्य की विचार- बुद्धि पर जब जंग चढ़ जाता है, उसके विचार-छोणों पर स्वार्थ, मोह एवं श्रश्ञान का गहरा काला रंग छा जाता है; तव उस मूले- मटठके मानव के विचार को जिन्दगी की सद्दी-सच्ची दिशा को ओर एक नया भोढ देने के लिए ही उन ज्योति-पुरुषों का श्रवतरण होता है ज़न-मंच पर | मनुष्य के अन्दर जो विचार-प्रवाई बहता रहता है, उसे अपनी विचार-कला के द्वारा प्रशस्त मार्ग की ओर घुमा देना ही उनके जीवन का उद्देश्य होता है। व्यक्ति के विचारों को एक नया मोड़ मिलते ही व्यक्ति, समाज और राष्ट्र की जिन्दगी एक नई अंगढ़ाई लेकर उठ खड़ी होती है, एक नय्री उथल-पुयत्र मच जाती है और बात-की-वात में समाज और राष्ट्र के जीवन का कायाकल्य हो जाता है|

भगवान्‌ महावीर और बुद्ध ने क्‍या दिया था संसार को! श्रहिसा, सत्य, समानता, वन्धुता और कर्तव्य-शीलता का विचार- सन्देश ही तो दिया था उन्त महान्‌ युग-तायकों ने मानव-जगत्‌ को; जिसने समाज और राष्ट्र के श्रोर-छोर तक उयत्-पुथल की क्रान्ति मचाकर भनुष्य को जीवन के एक नये मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया था |

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और, गॉधी जो की क्या देन है विश्व को ? हिंसा को शक्ति से टक्कर लेने के लिए डस गाप्टू-णिता ने सत्याग्रह द्वारा अरद्दितक विचार-कान्ति का हो तो वौजारोपश किया था ज्ञन मन में; जिसके पुण्य प्रभाव से राष्ट्र में स्वाधीनता का मंगल प्रमात श्राया |

और, मत बिनोवा भी बया दे रहे हैं श्रानकुल जनना को गाँव- गाँव में पैदल घुमघुमकर भूदान, नमत्तिददान आर जोयन दान के द्वारा एक प्रवल श्रद्दिसक विचार-कऋान्ति का ही तो मृत्रपात कर रहे है वे जन-जन के मन-मन में !

और विश्व-शान्ति के अग्रदून पंडित नेहरू विश्व की राजनीति क्षो क्या प्रदान कर रहे हैं श्राजकल ! वांदु सम्मेलन केम॑च से उन्होंने कृंबशील! के रुप में एक नये ढंग की विचार-दिशा ही तो दी है, डिसने विश्व के मन-मस्तिष्क को हिला दिया है श्रीर समूचे विरत्र की राजनीति को एक नया मोद दे दिया है !

.बिचार-क्ान्ति का चमत्कार गाँधी जो ने एक बार कट्टा था--'तौन पुदुपों ने मेरे जीवन

पर बहुत श्रविक प्रभाव डाला है। उनमें पहला स्थान में रायचन्द कवि को देता हूँ, दूसरा टाह्स्टाय को और तोसरा रशिकिन को। **“““डाह्स्टाय के 'नव विधान का सार! (गास्पेल इन दौफ)

'क्या करें! ( ह्वाइट द्वू टू ) आदि पुस्तकों ते मेरे हृदय पर गहरा

असर डाला विश्व-प्रेम मनुष्य को कहाँ तक ले जा सकता है

हमे में श्रधिकाधिक समझने लेगा किन्तु, उनकी ड्िशवर का राज्य

तुम्दारे दृद्य में है? ( क्रिगडम आॉँव दैविन इत्ञ विदिन यू ) पुत्नक

ने तो मुझे सुग्य ही कर लिया। उमको चंढ़ी गइरी छाप मुक्त

पर पढ़ी | “जिम सम्रय यह पुल्तक मेने पढ़ो, भरे विचार कई

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बातों में शंकाशील ये | कई मतंवा मुझे दास्तिकता के विचार भी श्राते थे | विज्ञायत जाने के समय तो मैं हिंसक था ; हिंसा पर मेरी श्रद्धा और अ्रद्टिसा पर अभ्रद्धा थी | यह पुत्तक पढ़ने के बाद मेरी अश्रद्धा चली गईं |”

गाँधी जी के इन उद्गारों और उनके परिणाम-स्वरूप जीवन के प्रकाश में यहतम्य एक और एक दो कौ तरह स्पष्ट हो नाता है कि मनुष्य अपने विचारों का मूर्त रूप है। उसका भविष्य उसके वर्तमान विंचार में है। मनुष्य अपने सम्बन्ध में श्राज जो विचार करता है, कल वह ठोक हूबहू वही बन जाता है। मनुष्य का जीवन उसके आपने विचारों का प्रतिविंव मात्र है। अतः एक दाशंनिक ठौक ही कहता है--“मभाग्य का दूसरा नाम विचार है ।”?

मानव-जाति का इतिहास इस तथ्य का साक्षी है कि विचार और संस्कार बदलने पर ही सामानिक एवं राष्ट्रीय क्रान्ति संभव है। समाज का निर्माण करने से पहले मनुष्य का निर्माण करना श्रनिवायें है जब तक मनुष्य अन्दर से नहीं बदलता, उसके विचार तथा संस्कार नहीं बदलते; तव तक कोई भी क्रान्ति सफल नहीं हो सकती | समानता, स्वतंत्रता, वन्धुता के सिद्धान्त को लेकर फ्रांठ में महान्‌ क्रान्ति हुई; पर श्ाज भी फ्रांस में ने समानता है और वन्पुता है| रक्त-क्रान्ति में प्रतिक्ान्ति के वीज परोज्ञष रूंप में छिपे रहते हैं; जो श्रवच्र मिलते हो दवे हुए रोग को तरह फूट पढ़ते हैं। बाइर से हम चादे कितना ही परिवततन करें, जब तक अन्दर से बुराई को जड़ को नहीं मिटाया जायगा; तव तक शोपण, श्रन्याय अनीति विपमता, रूढ़िवाद, कुप्रथाओं और नीयण॑ परम्पराश्री का मूलोच्छेद नहीं हो सकता | संत विनोवा के शब्दों में- “जीवन का मूल्य जहाँ बदलना होता है, वहाँ. सबसे पहले विचार-परिवतन दोता है | उसके वाद द्वदय का प्रसंग आता है।

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उसके बाद हृदय-परियर्तन का प्रसंग श्ाता है। फिर सत्नात्‌ जीवन परिवर्वित हो जाता है | पहले व्यक्तियों का, जिर समान का और सबसे पौछे सरकार का | व्यक्तियों के विचार बदलते ईं, और जैसे वनवान व्यक्ति समाज में विचार फैलाते हैं, वेंछी ही जल्‍दी समान में ऋान्ति होती है !”

शाचार के लिए शक्ति-लोत विचारों पर ही निर्भर रद्दता है। बौद्धिक विचार में सद्दी मार्ग निश्चित करने में सहायक होते हैं आचार में तेज प्रदोत विचारों से हो आता है। सच्चे और ययार्थ विचार छननेवाले या पढ़ने वाले को अपने श्रागें का रास्ता विलकुल साफ दीखने लगता है विचार-शुद्धि ही तो श्राचार-झुद्धि का मूलाघार है। समाज की जो-शौर् व्यवस्था में परिवर्तन श्ाने से पहले विचारों में कान्ति और परिवर्तन आना आवश्यक्ष है, श्रनिवार्य है, प्राकृतिक है | श्राचार-क्ान्ति के मध्याद के लिए विचारों को छान्ति उपा के समान है |

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संत विनोबा ने श्राज विचार-परिवर्तन से पिचार-छान्ति के द्वारा भारत के ्रोर-छोर को दिला दिया और विश्व का दिल भी इस और फिरा दिया है | आखिर, करोढ़ों एकड़ भूमि, गाँव के गाँव का दान, सम्पत्तिदान और जीवन-दान करने के लिए पृथ्वो-पुत्र क्यों तेयार हो रहे हैं ! इसीलिए कि तपोषन विनोवा ने जनता के पिचार-कोण बदल दिए हैं। वल्तुतः विचारों की शक्ति अशुव्म श्रौर उद्जन वम से भी श्रधिक है; जो एक ही माटके में समग्र विश्व के दिल श्रौर दिमाग को दहला सक्कती है विचारों का हुमिक्ष

दुर्भाग्य से भारत में जहाँ श्न्य चोजों का दुभित्ञ है, अभाव है, वहाँ विचारों का दुभिक्त भी यहाँ विकराल रूप में मौजूद है।

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सीधे, सच्चे, निधज्षु, मानवीय गुणों के विकासकारों और ध्यक्ति, समाज और राष्ट्र के निर्माणकारी प्रशस्त विचारों का प्रकाश यहाँ बिरल रुप में हो उपलब्ध होता है। यत्न-तप्र-सवंत्र विचारों पर या तो स्वार्थ को काली छाया पड़ी रहती है या उन पर जात- पांद श्रौर डँच-नीच के भेद-माव का गहरा रंय चढ़ा रहता है, अथवा उन पर साम्प्रदायिकता, प्रान्तीयता, रूढ़िवाद, गुर्डमवाद श्र निष्माण परम्पराश्रों का कुहरा छाया रहता है। इन गलत, रुढ़िपोपक, मानवता-शोपक एवं मेद-भाव से भरे विचारों कौ चदौत्त ही आज़ मनुष्य ने श्रपने भाइयों को कप में डाल कर अलग-अलग विभाग वना लिए हैं। निर्जीव परभपराश्रों, रूढ़ियों और घिसे-पिटे रीति-रिवाजों की धुधलो रेखाओं को घर्म का अंग मानकर ही मानव श्राज जीवन की सीधी-सच्ची राह से भूल-मटक गया है। बिसके परिणाम-स्वरूप मानवता, नैतिक चेतना का हास एवं पतन हुआ और समाज तथा राष्ट्र आनावार एवं भ्रष्टाचार की गन्दगी से सड़ने गा

जन-जीवन के श्राज के स्वरुप में, मानवता में मेद-विभेद बहुत हैं। उन्हीं से समाज, संघ श्रौर राष्ट्र में पोड़ा भी चहुत है। विचार- होनता एवं विचार-दरिद्रता ही समाज की इस भ्रन्ध स्थिति का मूल कारण है, यइ एक हजार एक वार असन्दिग्ध शब्दों में कहा जा सकता है मनुष्य के विचारों को शुद्ध और सात्तविक दिशा की ओर एक नया भोड़ देना ही इस रोग का एकमात्र उपाय है इसोलिए मारत के श्रणु-अ्गु में फ़ैलो इस विचार-दरिद्रता के रोग को मिटाने के लिए भारत के प्रधानमंत्री पंडित नेहरू राष्ट्र को भावी पोढ़ी से जोरदार अपील करते हं--.''तेज रप्लार से बदलते हुए इस अशुन्युग में जीवित रहने के लिए सोचना-विचारना अझत्या- दश्यक है | श्राज हमारे सामने क्रितनी समस्याएँ ऐसी हैं, जिन

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को इम समझे दी नहीं सकते; जब कि हम में विचार-शक्ति

हो | युवकों को विभेक्रपूर्ण अध्ययन द्वारा श्रपनों विचार-शक्ति का विज्ञाउ करना चाहिए। में चांइता हूँ कि आप विचार करें। क्योंकि मानवीय इतिहास के किमी युग में विचार इतना जरूरी नहीं रह है, ज्ञितना चह आज जरूरी है | यों, सोचना-विचार सदा आवश्यक रहा है; परन्तु विश्व तथा हमारे देश के इस संकमण काल में वह राष्ट्र वे श्रस्तित्व तक के लिए श्रत्वावश्यक्र हो गया है [”

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श्ौर, इधर हमारे समाज्ञ एवं ठंब्र में साम्प्रदायिक विलीनी- करण तथा सामाजिक एकौकरण होने पर भों समाज और संघ के आंगन में गहरा सन्नाटा है। समाज वे चारों कोणों में निराशा ही निराशा है। श्रमण-वर्ग तथा भावक्-दर्ग में विचार-शीलता एवं विचार-र्म्पन्नता का अभाव ही उसका मूल कारण है, ऐसा लगता है | विचाग-दिशा बदले विना कोई भी समाज्ञ श्रौर रंध गति- प्रगति की दोड़ में शागे नहीं बढ उऊता--यह सो फो सदी निश्चित है।क्योंकि जीवन में प्राण डालने वाली वल्ु विनार-क्रान्ति ही हे, जिसका उसाज में प्रायः दुभिक्त-छा ही है | समाज की एकमात्र आशा

जीवन के उच्च झादशों, तामाजिक दाचित्वों और कुछ कर गुजरने की भाषनाशओं के प्रति संब के क्णवारों और घर्म के ठैछ्ेदारों की दृष्टि बिलझुल घुघली हैं, उन पर परम्परावाद, हढ़िवाद, जढ़वाद और स्वर्थवाद कर यदरा काला चश्मा चढ़ा थे और परम्परा की मापा से श््ग हटकर वे छुछ छोच ही नहीं सकते | उमाज श्र उंध के पोवन का सवांगीणय स्पश करने की क्षमता उनमें नहीं है !

9, |.

मी ऐसी स्थिति में, समूचे समाज में केवल एक ही महामहिम व्यक्तित्व ऐसा दृष्टिगोचर होता है, जिसे समाज की उज्ज्वन्न श्राशा कहा जा सकता है | और थे है समूचे सधाज के आकर्षण-केन््र कविरित्न श्री श्रमरचन््र जी महाराज | समाज के मंत्र पर शाज वे वेजोढ़ हैं उनके जलते हुए विचारों के प्रकाश के आगे पुराण- त्वाँ के विचारों का अ्घेरा ठहर नहीं पाता। समाज की दुबंलताओों से प्रेमपूर्वक लड़ने और विचार-संघर्ष करने में उस लौह पुरुष की श्रात्मा खिल उठतो है। जैसा कि उन्होंने स्वयं कहा है--/विचारों को नया भोड़ देने के लिए प्रायः सघपर करना पढ़ता है। इसी कारण जव-जब विचार-संघर्प होता है, तो मुमे शानन्द आने लगता है। जो व्याख्यान मुनने के वाद तुरन्त ही ममाप्त हो जाय श्रौर ज्ञिम प्रवचन से विचारों में नई इलचल तथा कम्पन उत्पन्न हो, वह किस काम का ? कुछ हलचल होनो चाहिए, कुछ उथल-पुथत्न दोनो चाहिए; कुछ संबर्ष दोना चाहिए तभी तो जम-मानस में वद्धमूल श्रान्त संत्कारों की जड़ें छिलिगी; तभी तो वे ढीले पढ़ेंगे श्रीर श्रन्त में उसड़ कर नाट हो सकेंगे ।”

विचारक का व्यक्तित्व

विचारों में प्राणवत्ता विचारक के व्यक्तित्व से ही उभर कर आती है | विचारक का व्यक्तित्व जितना गहरा और श्राकर्पण-शील होगा, उतने ही प्रवल रूप भें उसके विचार एवं उद्गार समाज,

संघ तथा राष्ट्र के श्रन्तस्तल को जुम्कक को तरह श्राकर्षित करते हूँ |

कविरत्त श्री अ्परचन्द जौ महाराज समृचे स्थानक-वासी जैन न्य्ड ए. द् | उजेले ्ू हे समाज के श्राप के केन्द्र-विन्दु ईैं-- यह सूरज के उजेले की तरह

( १० )

'बन++ मनन >+कननन+ील+3-ीत-त++ >>“ जननी नज+> ००.

वननननननन न. ब्न्‍«भ मम मे न. के कमान हे हनलनभभ०

साफ है | जैन-जगती के इस ज्योतिर्धर विचारक और युग-द्रप्टा सन्त के ज्योतिमंय व्यक्तित्व की समाज-व्यापी चर्चा है। वे श्राज समात्र की श्रॉख, मन-मस्तिष्क तथा शत-शत शशाओं के मेस्मणि हैं | दृदय और मत्तिप्क का सन्तुलन जैठा उनमें हृष्टिगत होता है, वैसा समाज के किसी तत्व में नहीं। वे इतने वरिष्ठ, ख्यात- नामा एवं बिद्दान्‌ सन्त हैं, पर मिथ्यामिमान उन्हें छू तक नहीं गया हैँ | सब कोड मित्र शत्र नहीं कोड” ऐसी उनकी वृत्ति है। उनके निकट वैठना-मात्र ही एक प्रकार की सांस्कृतिक दीक्षा लेने के सहश है। उनका व्यक्तित्व इतना निशछुल, इतना मधुर तथा इतना श्राकर्पण-शौल है कि वह वलातू इमें बहुत-कुछ सीखने के लिए श्रनुप्राणित करता है | प्रतिभा, श्रोज और गाम्मीय उनमें मूर् हो उठे हैं। विचार-समन्न, आचार-समत्न, प्रतिमा-सम्पन्न एवं व्यवहार-सम्पन्न होने के साथ-साथ वे उदार-भावना के श्रस़रीम धनी हैं। उनका उज्ज्वल व्यक्तित्व जन-गया-मन पर श्रयना श्रमिट छाप छोड़ता चला जाता है

अस्तुत उपक्रम का मूल्यांकन ४०४०४ ४२४२४०७२६-१०९०६०९०९०९-०९०. हि करी कक

आज इमारा समाज, संघ और राष्ट्र विचार-दरिद्र है। आ्राज के श्रजु-युग में मी वह श्रनेक निर्मीव परम्पराश्रों का बोमा ढो रह्दा है, जीवन का रस सोखने वाली रूढियों झौर गलत रीति- रिवाजों के शिकंजे में घुरी नरह जकड़ा हुआ है। समान को आत्मा में जीवित-जागत चेतना का संचार करने के लिए नये घिरे से एक प्रवल विचार-कान्ति की महती श्रावश्यकता है; जिसमे समाज और संघ में नया जीवन श्राए, नये प्राण श्राएँ श्रौर कुछ इलचल्ल पैदा हो | इमी दृष्टि-विन्दु को ध्यान में रखते हुए विचार- शौलता के लिए, मानवता के श्रम्भुदव के लिए, समाज की विपमवा

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निज ++ क्‍डिआितन5 ०5

एवं अमट्रत मिटाने के लिए, प्राचीनता में नवीनना का रंग भरने के लिए, संघ और राष्ट्र की श्रन्ध स्थिति को स्वोतिर्मय करने के लिए, समाज की नव सना के लिए समान के इस मंहामहिम व्यद्ित्व के श्राध्यात्मिक, धामिक, वैचारिक, श्राचारिक और राष्ट्रीय छान्तिशील विचारों को वर्गीकरण का नया रूप देकर जन-मानस तक पहुचाने का यह एक नया उपक्रम किया यया है !

इतना ठो मैं श्ववश्य कहना चाहूँगा कि इन क्रान्त विचारों में समभो दर्शनों का मपखन सिमटा हुआ है। ठोस श्रौर समरूप मक्खन, जो चलने में स्वादिष्ट लगता है, किन्तु जिसे पचाना

व्यक्ति फे लिए हँसी-लेल नही होता दर्पण की तरद साफ और दूरगामी ये विचार रुढ़ि-चुस्त, स्वार्यपरल और परम्परा- मक्त तत्वों के गले श्राज भले ही उतर से, पर श्राने वाले कल में कवि श्री जो का यह यूद्म श्रौर गहरा विचार-विश्लेपण जन-मानस फे लिए एक प्रकाश-स्तग्म का काम करेगा--इसमें सन्देह नहीं।

एक बात श्र ये कोई वघे-वंघाये प्रकोष्ठ नहीं-हैं, बल्कि धारा के नये-नये मोइ श्रौर तस्गोन्मेप हैं। श्राजकल के धर्म- नेताश्रों और तमाज के कर्णघारों के शब्द बजते है; क्योंकि उनमें खोखलापन होता है | कवि भ्रो जी के शक्दों में खोखलापन नहीं, इसी से वे बजते नहीं उनमें एक श्रदूभुत श्राकर्षण' श्ौर अ्रद्॒क् गाम्मीय है। उनमें श्रनेक वाक्य भी श्रापफ्रो जरूरत से ज्यादा लगेंगे, मानो जरा-सी वात को विशाल झ्ावरण के साथ पाठकों के सामने उपस्थित किया जा रहा हो | लेकिन कुल मिलाकर उसमें आपको वातावरण की एक ऐसी ब्रदभुत स्टि मिलेगी कि श्राप बाह- वाह कर उठेंगे | उनकी विचार-शेली पर उनके व्यक्तित्व की छाया स्पष्ट है; जिसे प्रारम्म में देख कर तो श्रादमी सहमता है, लेकिन वाद में वही चीज उसे जीवन का मूल-भूत ठत्त्त मालूम पढ़ने लगता है |

इस प्रकार हम देखते हैं कि कवि श्री जी को इन विचार- फांक्यों में जोदन के नये दृष्टि-क्रोण हैँ, जोवद की समस्याश्नों श्रौर जीवन को एक नया रूप दिया गया है। वत्ठुतः उनके विचार व्यक्ति, समाज और राष्ट्र के जीवन की गहराइयों को पूर्णतया लू लेते है ऐसा कोई जीवनं-छोण नहीं, जो उनकी विचार-काम्ति के अभिनव प्रकाश घें असम्पृक्त रहा हो, जहाँ उनकी पैंनी दृष्टि की प्रकाशमयो किरण छिटकी हों |

इसके उाय-साय उनके विचार-दरशन की जो चिन्र-रेखाएँ कागज-के इन चिथडढ़ों पर खिची हुई हैं, वे केवल भालकियां ही नहीं देतीं, प्रत्युत वें बोलती हुई चलती भी हैँ, बिल्कुल उसो तरह कैसे किसी अच्छी पुस्तक की पंक्तियों का मूल बरसों बीठ लाने पर भी मन-मल्तिष्क में ताला जना रहता है | चह कहते हुए मेरे मन में लरा मो हिचकिचाइट नहीं कि विचारों के ये नये मोड़ एक श्रोर जहां समाज और राष्ट्र के हजारों ज्ञोगों को एक विस्तृत, मइत्तम ध्येय की ओर ग्रेरिव करने में समर्थ होंगे, वहाँ व्यक्ति के अन्तर की दीप-शिखाश्ं को भी मरपूर तेल देंगे, ताकि उनके प्रकाश में मानवता अपना नया डन्‍्म ले सके और एकता, समता तथा वन्धुता के पथ पर मानव-उंस्कृति अग्रसर हो उफे। इन प्राणुवन्त एवं लन्दनशोल विचारों की रेखाएँ अमिट हैं; इनका रंग चिरंगीदी है, इनकी नित-नूतन प्रेरणा-शक्ति अमर है !

उपउंहार में हम बह कहना चाहते है क्िश्नत्यन्त सहज, सरल) सीधी अभिव्येज्नना के ठाथ यह अमिचव प्रयास अपने मौतर बढ़ो गहराई, संश्लिष्ट अभिव्यक्ति और सर्वांगीए जीवन-आहियी शक्ति लेकर उामने रहा है। एक महान्‌ कृति को आत्म-वचा; आयध्वद्ा और गरिसा इसकी पंक्ति-पंक्ति.में बोलती है।- युग

"नननननन+ 2 मनन नम ०५५ +५ नन नली ने घन नल मिनी निज लीन तर का ननपनेता 'न्‍न नल न्मनप नम बैक नल्‍क

चैतन्य के अनुकूल नयी मानसिकता और वैचारिक नवीत्यान को जन्म दे सकेंगे विचारों के ये नये मोइ--ऐसा विश्वास है।

शेष में, यइ हार्दिक उल्लास प्रकट करने का मैं. लोभ-संवरण नहीं कर सकता कि विचारों की लिपि करने और पुस्तक को सर्वाडू छुदर बनाने में मेरे स्नेही साथी श्रीसुवोध मुनिजी का

. सक्रिय सहयोग मधुर स्थृति के रूप में सदा ताजा बना रहेगा |

कार्तिक-पूर्णिमा

९६- १-४५

जेन-भवन, ज्ोद्ामंडी, आगरा

“सुरेश मुनि

के कक डर

| 4० 3७] काचत्‌ प्रस्तुत सन्मति-प्रकाशन विचारों के नये मोढ़” को पाठकों के कर-कसलों में श्रपिंत करते हुए मेरा तनमन इर्षोल्लास से भर रहा है। कवि श्री जी आज हमारे समाज फी आँख हैं। उनके व्यक्तित्व में एक जज्ञता हुआ प्रकाश है | उनके विचार व्यक्ति के अन्तर को पकड़ कर ऋफभोर देते हैं; क्योंकि उन विचारों में नये प्राण, नयी चेतना और नयी क्रान्ति का महास्वर चोलता रहता दे। आज समाज तथा राष्ट्र के नव निमोण के लिए मानवता का सर्वाज्ञीण स्पशे करने वाले ऐसे शुद्ध, साक्त्विक विचारों के प्रचार की परम आवश्यता है। मुनि भ्री सुरेश जी ने कवि श्री जी के घिचारों का जो मक्खन समाज के सामने प्रस्तुत किया है, उसके ज्षिण समाज उनका सदा आशभारी रहेगा। समाज; संघ और राष्ट्र की विचार-दरिद्रता एवं मानसिक अभद्गता सिटाने में तथा जन-मानस से एक सावे- लौफिक चेतन्य जगाने में कवि श्री जी के ये विचार-अग़ुबम तूफानी लहरों का काये करेंगे, ऐसा पूर्ण विश्वास है।

प्रार्थी--

श्तनल्वाल जैन मीतल मंत्री, सन्‍्मति-ज्ञान-पीठ, आगरा

विषय-सूची

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आत्मानुभूति स्वभाव और विभाव शत्म-तीर्थ

सारा दायित्व अपने ऊपर हल

सुख कहाँ ! भौतिकता तथा आध्यात्मिकता

पिकारों से ह्ड़िए 3. हैंग०७ ७०१७

महात्मा और दुरात्मा सस्यय्‌ दशनन का महत्त्व निप्तित और उपादान अन्तर्जी वन रल शरीर और आत्मा. .... घधम और जीवन / ्‌ जेन-धम का सन्देश. धर्म का हृदय सत्य घढ़ा या व्यक्ति अन्तजीगरण तप

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धर्म का मूल सामायिक का चमत्कार तप किस लिए १. «» पाप, पुरय और धर्म... जीवित श्रद्धा

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धर्म और पंथ

विवेक ही धरम हे. «« क्रोध और प्रेम नकद धर्स

सानवता की पहली सीढ़ी सत्य ही भगवान है. »«« मशाल्रों के डंडे

जीवन का सवागीण विकास भाव हिंसा कि अकाश में ई'ठ फेको

२: विचार ओर आचार

जीवन की दोपांखें. ...- अहिसा के दो पहलू. .«-

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ज्ञान को कला बडी

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दृष्टि वदलिए

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विम्व और प्रतिविस्व ««

अन्ध-विश्वास

नई जिन्दगी

१० ह्विज़ बनो

११ विचार-संघर्प ५६३ १५ भारता नहीं, साधना है

१३ रोग की चिकित्सा. «« १७ आचारः परमो धर्म! «»« १६ जेन-धर्म की चुनौती

१६ कमे से उच्चता

१७ भक्ति और विवेक

१७ पवित्रता का आधार

१६ क्या अहिंसा अव्यवह्यय है ( २० शतिवाद को तोड़िए

२१ बीतराग के ये पुजारी

३: जीवन ओर नैतिकता

* जीवन और नेतिकता ««« ४२ भसानव औरदासच

११४ श्श्प १४६ १४६ १५३ श्श्र्‌ श्श्द . १६१ १६१३ १६५ १७९ १७३ श्ष्द १८5१ श्म्रे १८६ ध्ध्यु श्ध्र १६६

२०३ घर०्ड

१५

[गत मधुरता भी वांटिए इन्सान को इन्सान से खतरा सिनेमा ओर अनेतिकता श्रेम करना सीखिए , .... निष्पक्ष दृष्टि बडे फूल और कांटे

संसार दुखी क्‍यों है ! रद

सामाजिक चोरी

पैसे का गज जीओ और जीने दी... पा सन्तति-निरोध और संयम 2

इन्सानी सिक्के चलना सीखिए

१६ पं अमृत और विष

अपनी ओर देखो

कृत्रिम वसन्‍्त

विराठ चेतना

पाप से घृणा कि

४: संघ ओर परम्परा

संघ का महत्त्व

बदलती हुई परम्पराएँ *. श्रद्धा का केन्द्रीकरण

२०७ २०६ श्र श््ष ग्२ श्र ब्रश श्र६ २२१ श्र श्७ २४१ श४३ २४४ २४६ श्ष्८ २५०

श्श्३े

२५७

* बुड&

२६४

[घ |] संघ का कायाकल्प ..« धर्म ओर परम्परा. ..« सत्य का गला घोटिए जेन-संस्कृति की क्रान्तियाँ संघ क्‍यों नहीं पनपता

व्यक्ति और राष्ट्र राष्ट्रीय चेतना न्‍्न्ध भारतीय संस्क्रति और राष्ट्रीयता भारत की पाचन-शक्ति नेता कौन भावना की गरीबी मिटाइए प्रजातंत्र क्या है? .... समस्या का सही समाधान राष्ट्रकी आशा .. प्रान्तीयता का विष...

श्रम की अतिष्ठा पुरुषाथ बाद हा विचारों का वौनापन .... जोश के साथ होश भी चाहिए शक्ति का चमत्कार ««« राष्ट्रीय, दु्वेज्ञता एकल्ञा चल्ना रे ! कि

२७० र७१ र७६ द्८र श्प्र

. ]

सरस्वती, लक्ष्मी ओर शक्ति सानचन-्सानव एक

प्रश्न और उत्तर वन्धन किस ओर से .... फिर अन्तर क्‍यों है धर्म की कसौंदी क्या है क्या सब हिंसा वरावर हैं ? क्या जैन हिन्हु हैं ! गृहस्थ की अहिंसा-मयोदा

जाति ओर छुन्न पड की

करना और कराना. .««« शक गोत्र और अरएश्यता

लचसी पुरय से या पाप से

लड़की पुण्य से या पाप से

विवाह किस दृष्टि से

प्रवृत्ति और निवृत्ति

ओम और मोह

क्या कृषि आय-कर्म हे ?

भारत गुलाम क्‍यों बना

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३३१ ३३४ ३३६ ३४१ 440] ३४० 2५३ श्ध्८ 2६२ ३६७ श्द्ष्प ३७० श्७४ ३७६ इे८घ३ श्द५

(ंज हि ४57 ( |॥ ना (फ्ति (दि ७9*

अध्यात्म और पर्म १. आत्मानुमूति २, श्रात्म-तीर्य ३, शरीर ओर आत्मा

४. अन्तर्जागरण ५, धर्म और पंथ

आत्ानुभूति

साधक,चाहे वह गृहस्थ हो अथवा साधु हो, एक ही ध्वेय लेकर आये हूँ और वह महान्‌ ध्येय यही दे कि आत्मा को अल्लग और शरीर,इन्द्रिय एवं मन को अलग समझ लें आत्मा में पेदा होने वाले औद्यिक भावों को, क्रोध ञआदि विकारों को अत्लनग समझ लें और आत्मा को अल्लग समझ लें।

जिस साधक ने यह समझ लिया, वह अपनी साधना में हृंढ़ चन गया फिर संसार का कोई भी सुख था दुःख उसको विचलित नहीं कर सकता | जब तक यह भूमिका नहीं आती, तव तक मनुष्य सुख से मचलता है और हुःख से घवराता ह। जीवन की दोनों दशाएँ हं--एक सुख और दूसरी दुःख देती है। किन्तु, जब वक्त भेद-विज्ञान-द्शा को प्राप्त कर लिया जांता है, तव सुख व्िचलित कर सकता और दुःख दी | जब दुःख आए, तो दुःख में रह कर आत्मा सें रहे ओर जब सुख आए, तो सुख में रह कर आत्मा में रहे | और समझ लिया जाय कि यह तो संसार की परिणति है। जो श्रच्छा या बुरा चल रहा है, यह आत्मा का स्वभाव नहीं है। यह आत्मा का स्वरुप नहीं दे | यह तो पुद्गल के निमित्त से उत्पन्न होने वाली विभाव परिणति है। जब तक यह है, तव तक है, और जब चली जाएगी तो, फिर कुछ

नं दे | इस प्रकार भेद-विज्ञान की भूमिका प्राप्त कर लेने वाज्ञा आत्मा अपने स्वरूप में रमण करने लगता है

६: विचारों के नये मोड़

जेन-धरमं का यही दशन है। जैन-धर्म में चतलाए गए चौदह. गुणस्थान और: क्‍या हूं? थे यही वतल्ाते हैँ कि अमुक भूमिका, .पर पहुँच जाने पर ; सम्यक्त्व की प्राप्ति हो' जायगीं ओर अमुक भूमिका. पर क्रोध; अभिमान, माया और ज्ोभ छूट जाएँगे और अमुंक भूमिका में जाकर ज्ञानावरणीय, दर्शनॉंवशशीय, मोह और ,श्रन्तराय कमे हृट जाएँगे। फिर. आगे की भूमिका में आयुष्य आदि. शेष चार कर्म भी दूर हो जाएँगे। इसके पश्चात््‌ भ्रात्मा सवेथा विशुद्ध परमा- सं-स्वक्ृप को प्राप्त कर लेगी। यह है जुन:देशेन की स्थिति] *, , तो हमारी अहिंसा, सत्य, अ्रस्तेय और त्रह्मचर्य की जो साधना है, वह किस रूप में है? इसी रूप में फि हम इस शरीर में:रहते हुए भी शरीर से अलग हो सके शरोर में रहते हुए भी शरीर से अज्ञग का अथ क्या है ? अर है कि कर्मों का ज्ञय तो जच होगा तब होगा, किग्तु हम अप्रनी विवेक और बुद्धि से तो उससे अज्ञग हो सके। «, जब तक आयुष्य कम की प्रसम्भरा मौजूद हं, हमें शरीर में रहना हैं और जब तक नाम कर्म की धारा बह रही हू, ' हम शरीर से पृथक नहीं हो सकते! एक के वाद॑ एक शरीर का निर्माण होता ही जायेगा किम्तु चह शरीर और थे इन्डियाँ आत्मा से भिन्न हैं, जो इस परम-तत्व को समझते हैं. और उससें आस्थावान हो जाते हे, वे शरीर मे रहते हुए भी

आत्मानुभूति :

शरीर से अल्ञग-मालूम होते हूँ

, -इसे स्व-पर विवेक कहें,, भेद-विज्ञान कहें, आत्मा- अनात्मा का भान कहें, या आत्मानुभूति कहें; वास्तव में यही धरम है। समस्त साधनाएँ और सारे क्रिया-कार्ड इसी अल्ुभूति के लिए हूँ ब्रत, नियम तप और जप आदि का उद्तेय इसी अनुभूति को पाने के लिए है। ज्ञान, ध्यान) सामायिक और स्वाध्याय इसी के लिए किए जाते जिस साधक को यह आत्मानु भूति प्राप्त हो गयी, उस की मुक्ति दो गई, उसके भव भव के वन्धन छिल्न-भिन्न हो गये, वह कृताथथ हुआ और शुद्ध सब्चिदानन्दसय वत गया।

ग्‌ः दर रे

खमाव और विभाव

जैन-धर्म आत्मा की शुद्धता पर भी विश्वास करता है ओर शुद्ध होने की संभावना पर भी विश्वास करता है। वह अशुद्धता और शुद्धता के कारणों का भी वड़ा सुन्दर विश्ले- पण करता है। हमारे अनेक सहयोगी धर्म भी उस का साथ देते हैं। इसका मतलब यह हे कि आत्मा मलिनता की स्थिति में है, और स्वीकार करना भी चाहिए कि विकार उसमें रह रहे हूं; किन्तु वे विकार उसका स्वभाव नही हैं, जिससे कि आत्मा विकार-स्वभाव-मय हो जाय। स्व॒आव

४: विचारों के नये मोड़

बन नन -मिनल+-.++++९० +३०३६+ #>कक४2०क ०3७७ »3+5343+4335 3५७+५४++83-०3»4९५33343++क-क++क ढक०5०९००+> 3५५ ४०३५५५०७० “५०५५०

क्जजलजज ना

कभी छूटता तहीं है। जिस वरतु का जो स्वभाव है, वह कदापि उससे जुदा नहीं हो सकता। स्वभाव ही,तो वह बसतु है। और यदि स्वभाव चला गया, तो वस्तु के नाम पर रह क्‍या जायगा ? तो विकार आत्मा में रहते हुए भी आत्मा के स्वभाव नहीं बन पाते |

बस की मलिनता और निर्मल्ता के सम्बन्ध में ही विचार कर देखें। परस्पर विरुद्ध दो स्वभाव एक वस्तु में नहीं हो सकते ऐसा हो, तो उस वस्तु को एक नहीं कहा जायगा | दो स्वभावों के कारण वह वरतु भी दो माननी पड़ेगी पानी स्वभाव से ठंडा हैं। तो स्वभाव से गरम नहीं हो सकता आग स्वभाव से गरम दे, तो स्वभाव से ठंडी नहीं हो सकती | आशय यह है कि एक वस्तु के परस्पर विरोधी दो स्वभ्वाव नहीं दो सकते हूँ अतएव आत्मा स्वभाव से या तो विकारमय-मलिनं ही हो सकता है. था निर्मेल-निर्विकार ही हो सकता है

किन्तु, जेसा कि ऊपर कहा जा चुका है, आत्मा में दोनों चीजें है--मलिनता भी और निर्मेज्ता भी | तव अपने आप 'यह वात समक में जानी चाहिए कि बह दोनों शआत्मा के स्वभाव नहीं हूँ। दोनों उसमें विद्यमान हैं. अवश्य, मगर - दोनों उसमें स्वभाविक नहीं। एक चीज स्वभाव है और दूसरी चीज विभाव है, आगन्तुक हैं, औपाधिक दे और दोतों में जो विभाव रूप है। वही हृठ सकती है। स्वभाव

स्वभाव श्रीर विभाव : नहीं हट सकता | तो आत्मा का, स्वभाव क्‍या है ? ओर विभाव क्याई ? यह समभने के लिए चलन की मलिनता और निर्मत्ता पर विचार कर ल्ीजिए। वद्ध में मलिनता बाहर से आई दें। निमलता बाहर से नहीं आई। निमलता उसका सहजे भाव है, स्वभाव ६ै। जिस प्रकार निमलता वल्च का स्वभाव हे और मह्तिनता उसका विभाव है, ओआपाधिफ भाव है; उसी प्रकार निर्मे्ता आत्मा का स्वभाव है और विकार तथा वासनाएँ विभावष हूं जो धर्म वस्तु में किसी कारण से गया है, किन्तु जा उसका अपना रूप नहीं है, वही विभाव कहलाता है। ओर स्वाभाव वह कहलाता दे, जो चस्नु का मूल श्रोर असली रूप हो, जो किसी निमित्त कारण से उत्पन्न हुआ हो जेन-धर्म ने साना दे कि क्रोध, मान, माया श्र लोभ अथवा जो भी विकार आत्मा में मालूम हो रहे दें, यह तुम्दारे स््रभाव या निजरूप नहीं हैं। यह त्रिकार तुम्हारे अन्दर रह रहे हैं, इतने मात्र तुम भ्रान्ति में मत पड्टो। वे कितने ही गहरे बुसे हां, फिर भी तुम्हारा अपना रूप नहीं है| तुम, तुम दो, और विकार, विकार हैं अन-धर्म ने इस रूप में भेद-विधान की देशना की है। भेद-विज्ञान के विपथ में हमारे यहाँ कटद्दा गया हं--

५१० 42 विचारों के नये मोड़ तन मा अल इक और शक

भेद-विज्ञानत: सिद्धाः ये सिद्धा: किल केखन “आचार्य श्रमृतचन्द्र

अनादि काल से आज तक जिंतनी भी त्रात्माओं ने मुक्ति प्राप्त की है, और आगे प्राप्त फरेंगी, वह तुम्हारे इस फोरे क्रिंयाकाण्ड से तहीं की है और करेंगीं। यह तो निर्मित्त मात्र है। जड़ और चेतन को अंसग-अल्गं समभने से ही मीक्त प्राप्त होता है| : जड़ और चेतन फो अंत्ग-अलग समंकेना एक महत्व: पूण दृष्ठि-कोर्ण द्वै। इस दृ््टिकोश से जब आत्मा देखती है और साधना करतो है, तभी जीवन में रस आता है। वह रस क्या है ? आत्मा भेद-विज्ञान की ज्योत्ति को आरे- आगे अधिकाधिक प्रकाशित करती 'जाती- है, और एक दिन उस स्वरूप में पहुँच जाती हू कि दोनों में सचमुच ही भेद्‌ हो जाता है। जड़ से आत्मा सम्पूर्ण रूप से प्रथक हो जाती है और अपने असली स्वभाव में आजाती है।

ही > है, रे आत्मं-तीर्थ मनुष्य के भीतर प्राय: एक ऐसी दुव्न चि काम करती रहती

है कि बह समस्या का समाधान अन्दर तलाश नहीं करता, वल्कि वाहर खोजता फिरता है जहाँ जख्म है; पहाँ मरहम

आत्म-तीथ : ११

नहीं लगाता, चाहर लगाता ! हाथ में चोट लगी और पेर में दवाई लगाई, तो क्या होगा ? सिर दुख रहा है और हाथों में इन्दन लगाया, तो फ्या ददे मिद जाएगा ? रोग जहाँ हों, वहीं दवा लगानी चाहिए। यदि दाहिने हाथ में कीचढ़ लगा है; तो बायें हाथ पर पानी डालन से वह कैसे साफ होगा

हाँ, तो हमें देखना चाहिए कि काम, क्रोच, मद, लोभ आदि फा मेल कहों लगा है? यदि वह मल्र कह्दीं शरीर पर लगा है, तव तो क्रिसी तीथे म॑ं जाकर धो लिया जाय | पर वहा तक भी जाने की क्या जरूरत है ? इवकी लगाओगे कहीं इधर-उधर किसी तालाब या नदी में, तो भी वह दूर हो जाएगा। जनधम कहता है,वह मेल श्ात्मा पर लगा है। अतः दुनिया-भर के तीथों में क्यों भटकते फिग्ते हो ? सब से बढ़ा तीथ तो तुम्हारी अपनी आत्मा ही दूं क्यों कि उसी में तो बहती हैं. अहिंसा और भ्रम की निर्मत्न धाराएँ, उसी में डुबकी लगाओ, तो शुद्ध हो जाओगे जहाँ अशुद्धि है, वहीं की दी तो शुद्धि करनी है रे

जेन-द्शन बढ़ा आध्यात्मिक दर्शन दे और इतना ऊँचा दे कि मनुष्य को मनुष्य के अन्दर चंद करता हैं। मलुष्य की इृष्टि मलुप्य में डालता हद अपनी महातता अपने अन्दर तन्नाश करने को कहता है क्‍या तुम अपना कल्याण करना चाहते हूं। तुम पूछते हो कि कल्याण

१४ : विचारों के नये मोड़

अमन नतज+ अनननननना+ मम ही हनमन शनीनआडजल अिति+लल

तो करना घाहते हैं, पर कहाँ करें ? तो जैनधर्मे का उत्तर साफ है कि जहाँ तुम हो वहीं पर, वाहुर किसी गंगा में था ओर किसी नदी था पहाड़ में नहीं। आत्म-कल्याण के लिए, जीवन-शुद्धि के लिएया श्पने अंदर में सोए हुए भगवान्‌ को जगाने के लिए एक इंच भी इधर-उधर जाने को जरूरत नहीं है तू जहाँ हैं, वहीं जाग जा और भात्मा का कल्याण कर ले।

एक विद्वान ने फहा--“आपके यहाँ ४५ लाख योजन का

मोक्ष माना गया है और एक योजन चार हज़ार कोस का है आप बड़े-बड़े दा्शनिकों से चर्चाएँ करते हैं और मोक्ष इतना लस्घा-चौड़ा मानते हैं कि जिसकी कोई ह॒द द्वी नहीं दै।” मैंने कहा--“इतना तो मानना ही है। इतने बड़े की जरूरत भी तो दे द्वी। दमने मोक्ष इन्सान के लिए माना है और जहाँ इन्सान है, वहाँ मोक्ष भी है। इन्सान का कदम ४४ लाख योजन तक है, तो ऊपर मोत्त भी ४४ लाख योजन लम्बा-चौड़ा है। मोक्ष इन्सान को मिलता है। इन्सान जब श्रात्म-शुद्धि करेगा, तो सीधा मोक्ष में पहुँच जायगा | उसे एक इंच भी इधर-उधर नहीं होता पढ़ेगा | अतश्व जहाँ हो, वहीं बैठ जाओ। जहाँ हो वहीं आत्मा में डुबकी लगा दो | वहाँ अमृत की गंगा वह रही है| संयम की साधना की ओर जितने लगोगे, उतने ही मोक्ष के निकट होते जाओगे , मै धोकर निर्मत्त होते जाओगे | और मेज्ञ घुलते-घुज़ते जब

सारा दायित्व अपने ऊपर : १३

उसका आखिरी कण भी धुल जाएगा तो, वहीं के वहीं सोच पा ल्ञोगे ।”

यह सुनकर वह विद्वान्‌ हँसे और वोले-“वढ़ा गजब का रूपक वना रक्खा है!” हु

मैंने कहा--“चनाया नहीं है, सत्य ऐसा ही है।

आप ही कहिए, मोक्ष किसको मिलेगा ? क्या ऊँठ, घोड़े यथा राक्षस को मिल्तेगा ? नहीं। वह तो मनुष्य को हो सिल्लेगा | अतः जहाँ मनुष्य है, वहीं मोक्ष होना चाहिए। जैनधरम अपने-आप में इतना विराट है कि वह गंगा को अपने ही अन्दर देखता है! कहीं अन्यत्न जाने को नहीं कहता, सब से बड़ी गंगा उसके भीतर वह रही £े और वह तीन राहदों पर वहती है| वह मन के लोक में से, वचन के लोक में से और काया के लोक में से वह रही है मगर डुबकी लगेगी तभी, जच आप त्गाएँगे। हजारों तीर्थों में स्नान कर आये, किन्तु अन्द्र की गंगा में स्नान नहीं किया, तो सब बेकार !

श्र हु छू

सारा दांयित अपने ऊपर

जेनधर्म ने आत्मा को ही केन्द्र वना दिया है | गृहस्थ हो था साधु हो, उसकी आत्मा पर ह्वी सारा भार डाल दिया

१४ : विचारों के नये मोड़

करन सवलसनन्‍व नर “मननममकन.. डममकर अर. अमन. 2 बने उन नमन 3 बन जग म० 2० दम हवनटरनमनलममरननन«भन. लमनम॥ ९००#॥ हमाना,

है। उसका कहना ह-“'तेरा जीवन तेरें पास है। तू चाहे उसे लोहा वनाले, चाहे सोना बना ले | उसमें से काँटे पैदा कर ले या फूल पैदा कर ले | नरक बता ले या रबगे चना त्ते। दोनों का निर्माण करना तेरे हाथ की बात है ! सारे विश्व में जो जगह है, उसका महत्त्व तेरे ही अन्द्र है.”

मनुष्य दुबल, इताश और निराश हो कर चलता और दूसरे का सहारा ले कर घल्नता है। उसे दूसरे की उ'गलियाँ पकड़ने की आदत है| इसी आदत के कारण उसने देवी-देवताओं का पल्ला पकड़ा और दुतिया-भर के

आदमभियों को रोशनी समझा और समझा कि येभेरा कल्याण कर देंगे।

इसी भरोसे, कोई बीमार पड़ता है तो हजारों देवी-देवे- ताओं को मानता फिरता है | लक््मी आई और चली ,गई, तब भी' देवी-देवताओं की मनौती कर रहा है और बेदा-पोता चाहिए तो भी उन्हीं की शरण ले रद्दा है। इस प्रकार हुभग्य से, आध्यात्मिक और लौकिक दोनों जिन्द्गियों को अपने-आप निर्माण करने के जो 'हंग थे; वे इन्सान के हाथ से निकल्न गये | उसने सोचा कि संसार में हूँगा, तो कोई दूसरा मेरे जीवन का निर्माण कर देगा और आध्यात्मिक जीवन में रहूँगा, तो वहाँ भी दूसरे से आनन्द मिलेगा) इस “तरह , मनुष्य की सांसारिक जीवन भी दूसरों :प्ररं निर्भेर हो-गया है और आध्यात्मिक साधना की जड़ सी

सारा दायित्व अपने ऊपर : १४

खोखली हो गई है |

भगवाय महावीर ने और जेनधर्म ने .मनुष्य जाति को यह महान्‌ संदेश दिया हैं कि तेरा चनाव और विगाड़ तेरे ही हाथ में है। तू आप द्वी वन सकता दे ओर आप ही विगड़ सकता है तू जिधर चलेगा, उधर ही पहुँच जाएगा। ये संसार के #ःख, आपत्तियों श्रीर संकट, जो भी हैं, वाहर से नहीं रहे हैं, वह अन्दर ही अन्दर उत्पन्न हो रहे हैं! और जो भी सुख और वेभव और अच्छाइयां हैं, वे भी वाहर से नहीं डाली जा रही हैं। उत्तका उद्गम स्थान भी त्तेरा अन्त:प्रदेश ही है। ओर आत्मा के वनन्‍्धनों को तोइने की कल्ला भी वाहर से नहीं आएंगी, बहू भी अन्दर ही पैदा होगी। तुझे पाप के भागे पर कौन चला रहा:ह ? और पुण्य के भार्ग पर भी कौन धक्का दे रहा है तू स्वयं ही चल रहा हू | ऐसा तो नहीं दे कि कोई घसीट कर ले जा रहा हो जिस ओर भी तू चल रहा है, अपनी अन्तः भेरणा से ही चल रहा है। और धर्म के सागे पर भी, जहाँ पाप और पुर्य अलग होते दिखाई देते हूँ उस पवित्न राह पर भी,तृ स्वयं ही चल सकता है यह महान्‌ और महत्त्वपूर्ण संदेश हमारे सामने इस रूप में आया है--

स्वयं कम करोत्यात्मा; स्वयं तत्फलमश्नुते स्वये भ्रमति संसारे, स्वयं तरंमाद्विगुब्यते || - अथोत्‌--यह आत्मा स्वयं कर्म करती है, अपनेन्आाप

१६ : विचारों के नये मोड़

समन समन मन ननन-नननन-कपभमननक कनना मनाने... वकधनक नमन *% की अन क+.. ०. रन नमन मनननःओकता टन कल नानक,

चन्धन में वधती है, अपने-आप अपने-आपको चन्धन में डालकर मजबूत हो जाती है, और जब अपने-आप वन्धन डाला है, तो उसका फल भी अपने-आप भोगती है। कोई दूसरा उसे चनन्‍्धन में डालता है, और म्र कोई भुगवाता है.

शआत्मा इस संसार में निरन्तर प्रिभ्रमण कर रही है। कभी नरक में और कभी स्वर्ग में जाती है ओर जीवन क। भूला निरंतर घृमता रहता है, एक क्षण के लिए भी कुछ विश्राम नहीं है। यह अ्रमण भी आत्मा स्वयं दी कर रही है और इस परिभ्रमण से छुटकारा पाना है, तो कौन छुटकारा दिला देगा ? छुटकारा देने या दिलाने वाला और कोई नहीं होगा, यही आत्मा होगी आत्मा स्व्रयं अपने-वन्धनों को काटेगी अ्रन्द्र से चेतना जाग जायगी), तो