2095 ९व 0५7-++ 2707, 3, 3. 56४ |. £. 5. ((२७६३.)

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प्रथम संस्क्ररण, १६४० मुक्य २)

#9॥#६5#९एकवं॥5 धै।05७ री ध_्व्आ$|क६07, 7९9॥00५८६०॥, शा।0६8६09॥ 200 70085 ९६८, वा6725287५९( ०५ ४७ 29॥[8 (४४५८४५६५.

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7879० (357], 7०.

आमुख

पंजाब यूनिवर्सिटी ने सितम्बर १६४८ में 'पब्लिकेशन ब्यूरो (अकाशन विभाग) नामक पुक नई शाखा इस उद्देश्य से स्थापित की कि हिन्दी और पंजाबी भाषाओं के साहित्यों को सम्पन्न तथा सम्दद्धि- शाली बनाने सें यूनिवर्सिटी भी समुचित योग दे सके अतएव ज्ञान, विज्ञान तथा साहित्य सम्बन्धी मोलिक ग्रन्थों की रचना, अन्यान्य भाषाओं की इस प्रकार की उत्तमोत्तम पुस्तकों के अनुवाद वथा छात्रगणों की शिक्षा के लिए इन विषयों की पुस्तकों का निर्माण अथवा उनका प्रामाणिक रूप में संकलन एके संशोधन करके सम्पादन--इन सभी विधियों द्वारा उक्त उद्देश्य की पूर्ति करने का यव्न किया जा रहा है

प्रस्तुत पुस्तक 'लेख-लतिका! में हिन्दी के प्रारम्भिक छात्रों के लिए कतिपय सरल निबन्धों का संकलन किया गया है निबन्धों के चुनाव में भाव और भाषा का विशेष ध्यान रखा गया है जिससे आरम्भिक छात्र उन्हें सुगमता से चुद्धिस्थ कर सके एवं स्वयं सोच-विचार करने की शक्ति में भी यथेष्ट भेरणा प्राप्त कर सके पाठकों की शानवृद्धि के लिए लेखकों का संज्षिप्त परिचय और किन्हीं कठिन शब्दों के अर्थ भी दे दिये हैं। आशा है कि पाठक वर्ग इनसे सम्रुचित लाभ उठावेंगे।

यूनिवर्सिटी प्रकाशन विभाग” की ओर से संपादक और सुद्गक के प्रति सन्‍्वोष. प्रकट करता हुआ में इस पुस्तक में संकलित सभी लेखकों ग्रधवा उनके उत्तराधिकारियों एवं प्रकाशकों का भी कृतल्ञता- पूर्वक धन्यवाद करता हूँ अपने लेखों को संगृह्दीत करने की अच्ुुमति देकर उन्होंने केवल अपने सौजन्य का परिचय दिया है, अपितु इस प्रान्त के विद्यार्थीमंडल को भी हिन्दी के लब्ध-प्रतिष्ठ लेखकों की सुन्दर रचनाओं के अनुशीलन करने का सौभाग्य प्रदान किया है .

, इस पुस्तक को दोष ठथा त्रुटि रहित बनाने का यथासंभत्र पूर्ण थत्न किया गया है। तथापि नित्तान्त निर्दोपता असंभव है। पाठक-पाठिकाओं से धार्थना हैं कि थदि उन्हें कोई च्रुटि दृष्टियोचर हो तो वे कृपया सुमे सूचित कर जिससे अगले संस्करण सें उसका उचित संशोधन किया जा सके। ._ शिमलो | . ऋआजमगहिदारी सेठ, सेक्रेट्रो, सितंचर १९,१६२० यूनिचसिटी पब्लिकेशन ब्यूरों

लेख-सूची

लेख लेखक प्ष्ठ आसुख प्राफ़थनन पथ, बातचीत “द्री पं, बालकृष्ण भट्ट... » आ्रात्म-कथा--रुकूल में महात्मा गाँधी हे साहित्य की महत्ता “श्री पं. महावीरप्रसाद द्विवेदी ... १४७ ४, क्‍या जानवर भी सोचते हैं का ३७. ५४ पे ५८४, कतव्य और सत्यता डाक्टर श्यामसुन्दरदास ... २३ ६, आकाश-गद्भा श्री प॑. रामदास गौड़ .-« २६ “७, मज़दूरी और प्रेम प्रो० पूर्णलिंह »« हे ८, राजाओं की नीयत से बरकत श्री प॑, चन्द्रधर गुलेरी ०» ४४ ५४६, राम और भरत > “श्री पं. रामचन्द्र शुकू »»« ४८ १०, चुढ़िया और नोशेरवाँ श्री पं. पद्मसिंह शर्म्मा ईैम ११. भेड़ियों द्वारा पाले हुए लड़के श्री सन्‍्तराम बी. ए, »». ६१ ५३२, स्वाधीनता ; “श्री इन्द्र विद्यावाचस्पति..... ७३ 2१३, विज्ञान श्री पदुमलाल पुतन्नालाल बख़शी ८२ ४, विजया की प्रथम-प्रतिष्ठा 5 “श्री आचाय॑ विश्वचन्धु २०६०४ ५४, दीनों पर प्रेम “श्री वियोगी हरि "०० ६७ ३६. मनुष्य और समाज रघुनन्दन «० ३१०१ ५८३७, सब्चय श्री पं० जनादन मा कण्प ५4८. विश्राम - श्री आनन्दकुमार «० १६ १६. सास और ननद श्रीमती राजकुमारी बिन्दल ,.. ११६

(क) लेखक-परिचय ,.,

हा »«« १२६-१४% (ख) अर्थावली

कद «०» ३४७-१०९०

प्राकथन

हिन्दी के सरल निबन्धों का यह संग्रह हिन्दी के प्रारम्भिक छात्रों के लिए. तैयार किया गया है। इसमें हिन्दी-निबन्ध के प्रथम आचाय पं० बालकृष्ण सह्ट से लेकर आजकल के उदीयमान लेखकों तक का समाहार किया गया है। इस प्रकार यह संग्रह पिछले लगभग एक सौ वर्षों की निबन्ध-प्रगति का प्रतिनिधित्व करता है

निबन्धों के चुनाव में जद्दां विषयों की विविधता और उपादेयता का विचार रखा गया है, वहां प्रारम्भिक छात्रों की बौद्धिक क्षमता पर भी पूरा ध्यान दिया गया है।भाषा का काठिन्य और प्रतिपाश् विषय का गास्भीय उनकी कोमल ग्राहक-शक्ति के अनुरूप ही रखने का बत्न किया गया है।

लेखों के संकलन में कालानुक्रम का अलुसरण किया हे इसका विशेष लाभ यह है कि इसके द्वारा जहां विपय-भेद और : रूचि-वैचिब्य में कोई अन्तर नहीं पढ़ता, वहां भाषा और भावों के क्रमिक विकास का और लेखकों के परस्पर भाव-साध्श्य और भावों के आदान-प्रदान का भी एक स्पष्ट चित्र मिल जाता है।

लेखकों के सम्बन्ध की साधारण जानकारी 'लेखक-परिचय” में दी गई है और सुकुमारमति छात्रों की सुकरता के लिए, अन्त में, एक अ्र्थावली' भी क्वगा दी है। पाठकों को अनावश्यक कष्ट से बचाने के लिए मूलपुस्तक में उन सभी शब्दों के साथ तारक “चिह्न लगा दिया है जिनके अर्थ अर्थावली में दिये हैं। छात्रों के बौद्धिक विकास को ध्यान में रखते हुए साहित्यिक विचेचन! को स्थान नहीं दिया गया | लेखकों की रचना केल्अध्ययन को ही विचेक-दृद्धि ओर भाषा-क्यान के लिए पर्यात्त समझा गया है। आशा है यह संग्रह अपने निर्दिष्ट उद्देश्य की पूर्ति में यथेष्ट सफल सिद्ध होगा

अन्त में में उन सब लेखकों और प्रकाशकों के प्रति कृतज्ञता का प्रकाश करता है जिन्होंने अपने निबन्धों को इस संग्रह में सम्मिलित करने की अनुमति देकर हिन्दी के प्रसार में सहयोग प्रदान किया हैं। चस्तुतः सरस्वती की सेवा के कारण वे सभी सरस्वती-भक्तों के घन्यवाद के पात्र हैं।

पंजाब यूनिवर्सिटी प्रकाशन विभाग --रघुनन्दन शिमला १६-६-४

लेख-लवतिका

०9070720०7::::07/ 7: जन

२्‌ लेखलतिका

>> -ज जि नलडललजललजजज जि ली जज जज जज ++

>> जल स्‍ जल जज + जी न्‍ जा

वही हमारी साधारण बातचीत का कुछ ऐसा घरेलू ढंग है कि उसमें करतल-ध्वनि का कोई मौका है, लोगों को कहकहे उड़ाने की कोई बात ही रहती है ।हम दो आदमी प्रेम-पूषंक संज्ञाप कर रहे हैं।कोई चुटीली बात गई हँस पड़े मुसकराहूट से ओठों का केवल फड़क उठना हीं इस हँसी की अन्तिम सीमा है। स्पीच का उद्देश्य सुननेवालों के मन में जोश और उत्साह पैदा कर देना है। घरेलू बातचीत मन रमाने का एक ढंग है। इसमें स्पीच की वह सब संजीदगी* बेकदर हो धक्के खाती फिरती है जहाँ आदमी को अपनी जिंदगी मज़ेदार बनाने के लिए, खाने-पीने, चलने-फिरने आदि की जरूरत है वहाँ बातचीत की भी उसको अत्यंत आवश्यकता है। जो कुछ मवाद” था घुआँ जमा रहता है वह बातचीत के ज़रिये भाप बनकर बाहर निकल पड़ता है| चित्त हलका और स्वच्छ हो परम आनंद में मगन हो जाता है। बातचीत का सी एक ख्लास तरह का सज़ा होता है। जिनको बांतचीत करने की -लत पड़ जाती है वे इसके पीछे खाना-पीना भी छोड़ बैठते हैं। अपना बड़ा हज “कर देना उन्हें पसन्द आता है पर वे बातचीत -का मज़ा नहीं खोया चाहते | रातिसन क्रसो* का किस्सा बहुधा लोगों ने पढ़ा होगा जिसे १६ वे तक मनुष्य का मुख देखने को भी नहीं मिला कुत्ता, बिल्ली आदि जानवरों के बीच में रह १६ वर्ष के उपरान्त उसने फ्राइडे के मुख से एक बात सुनी | यद्यपि इसने अपनी जंगली बोली में कहा था पर उस- समय राबिंसन को ऐसा आनन्द हुआ मानो इसने नये सिरे से फिर से आदमी का चोला पाया इससे सिद्ध होता है कि सनुष्य की. वाकशक्ति में कहाँ तक लुभा लेने की ताकत है | जिनसे केवल पत्न-व्यवहार है, कभी एक बार भी साक्षात्कार नहीं हुआ उन्हें अपने प्रेमी

रे

बातचीत , डर

नजजीजी औज-ल+ली जी लीजीली जल जब ्ज़ि जज जज जज जज जज जज + है ऑल जा जज तल जल रू

से बात करने की कितनी लालसा रहती है। अपना आभ्यंतरिक भाव दूसरे पर श्रकट करना ओर उनका आशय आप ग्रहण कर लेना केवल शब्दों के ही द्वारा हो सकता है। सच है, जब तक. सनुष्य बोलता, नहीं तब तक उसका गुण-दोष़ प्रकट नहीं होता। बेन जानसन का यह कहना, कि बोलने से ही मनुष्य के रूप का साक्षात्कार होता है, बहुत ही उचित जान पढ़ता. है | इस बातचीत की सीमा दो से लेकर वहाँ तक रखी जा सकती है जहाँ तक उनकी जमात मीटिंग या सभा समझ ली जाय। एडिसन* का मत है कि असल बातचीत सिर्फ दो व्यक्तियों में हो सकती है. जिसका तात्पय यह हुआ कि जब दो आदमी होते हैं तमी अपना दिल एक . दूसरे ; के सामने खोलते हैं। जब तीन हुए तब वह दो की बात कोसों दूर गई। कहा भी है-छ: कानों में पड़ी बात खुल जाती है? | दूसरे यह कि फिसी तीसरे आदकझ्ली के जाते ही या-तो वे दोनों अपनी बातचीत. से निरस्त हो बेढठेंगे या उसे निपट मू्ख अज्ञात्री समझ बनाने लगेंगे | जेसे गरम दूध और ठंडे पानी के दो बरतन पास साँट के , रखे जायेँ तो एक का असर दूसरे सें पहुँचता है, अर्थात्‌ दूध ठंडा हो जाता है ओर. .पानी गरम, वेसे ही दो आदमी पास बेठे हों तो एक का शुप्त असर. दूसरे पर पहुँच जाता है, चाहे एक-दूसरे को देखें भी नहीं, तव बोलने की कौन कहे एक के शरीर की विद्य॒ त्‌ दूसरे में प्रवेश करने लगती है| जब पास बेठने का इतना असर होता है तब बातचीत सें कितना अधिक ... असर होगा, इसे कौन स्वीकार करेगा। अंस्तु, अब इस भ्बात को तीन आदमियों के साथ में. देखना, चाहिए। मानों एक 'त्रिकोश-सा बन जता है। तीनों चित्त मांनो तीन कोश ओर तीनों की सनोवृत्ति के श्रसरण की धारा मानो इस त्रिकोश

|

लेखलतिका

की तीन रेखाएँ हैं | गुप-चुप असर तो उन तीनों में परस्पर होता ही है। जो बातचीत तीनों में की गई वह मानो अंगूठी में नग सी जड़ जाती है उपरांत जब चार आदमी हुए तब बेतक- ल्लुफ़ी को बिलकुल स्थान नहीं रहता खुल के बातें होंगी जो कुछ बातचीत की जायगी वह “फ्रार्मलिटी”,* मौरब और संजीदगी- के लच्छे में सनी हुई होगी चार से अधिक की बात- चीत तो केवल रामरमौचल कहलावेगी | उसे हम संलाप नहीं कह सकते | इस वातचीत के अनेक भेद: हैं दो बुड्ढों की बात- चीत प्राय: जमाने-की शिकायत पर हुआ करती है वे बाबा आदम के समय की ऐसी दास्तान" शुरू करते हैं जिसमें चार सच. तो दस भूठ एक बार उनकी बातचीत का घोड़ा छूट जाना चाहिए, पहरों बीत जाने पर भी अंत होगा। प्राय: अंग्रेज़ी राज्य, परदेश और पुराने समय की घुरी रीति-नीति का अलु- मोदन और इस संसय के सब्‌ भाँति ज्लाथक नौजवानों की » निन्‍्दा उनकी बातचीत का मुख्य अकररंण होगा। पढ़े-लिखे हुए तो शेक्सपियर, मिलटन, मिल और स्पेंसर उनकी जीभ के आगे नाचा करेंगे अपनी लियाकत के. नशे में चूर-चूर “हमचुती दीगरे नेस्त”* अक्खड्पन की चर्चा छेड़ेंगे ।. दो हम- सह्देलियों की चातचीत का कुछ जायका ही निराला है। रस का समुद्र मानो उमड़ा चला रहा है। इसका पूरा स्वाद उन्हीं से पूछना चाहिए जिन्हें ऐसों की रस-सनी बातें सुनने को कभी भाग्य लड़ा है। 2 दो बृढ़ियों की बातचीत का मुख्य प्रकरण, बहू-बेटी वाली हुईं तो, अपनी बहुओं या बेटों का गिल्ल-शिकवा होगा या वे विरादराने का कोई ऐसा रामरसरा छेड़ बैठेंगी कि बात करते- करते अंत में खोढ़े दान्त निकाल लड़ने लगेंगी। लड़कों छी बातचीत, खिलाई हुए तो, अपनी-अपनी तारीफ़ करने के बाद

ब्स्िज्िजीजिल तीज:

बातचीत '

वे कोई सलाह गाँठेंगे जिसमें उनको अपनी शैतानी जाहिर करने का पूरा मौका मिले | स्कूल के लड़कों की बातचीत का उद्देश्य अपने उस्ताद की शिकायव या तारीक़ या अपने सह- पाठियों में किसी के गुण-ओऔगुण, का कथोपकथन होता है पढ़ने में कोई लड़का तेज़ हुआ तो कभी अपने सामने दूसरे को कुछ गिनेगा। सुस्त और बोदा हुआ तो. दबी बिल्ली का-सा स्कूल भर को अपना गुरु ही मानेगा | इसके. अलावा बातचीत की और बहुत:सी किसमें हैं ।राजकाज की बात, व्यापार- सम्बन्धी बातचीत, दो मित्रों में श्रेमालाप इत्यादि | हमारे देश में नीच जाति के लोगों में बतकही होती है। लड़की-लड़केवाले की ओर से एक-एक आदमी बिचवई* होकर दोनों के विवाह सम्बन्ध की कुछ बातचीत करते हैं उस दिन से बिरादरीवालों को जाहिर कर दिया जाता है कि अम्ुक की लड़की का अमुक के लड़के के साथ विवाह पक्का हो गया और यह रस्म बड़े उत्सव के साथ की जाती है चंड्खाने की बातचीत भी निराली होती हैं निदान बात करने के अनेक प्रकार और ढंग हैं योरुप के लोगों में बात करने का हुनर .है। “आहे आफ कनचरसेशन”* यहाँ तंक बढ़ा है कि स्पीच और लेख दोनों इसे नहीं पाते। इसकी पूर्ण शोभा काग्यकला-प्रवीण विद्वन्मंडली में है। ऐसे चतुराई के प्रसंग छेड़े जाते हैं कि जिन्हें सुन कान को अत्यंत्त सुख मिलता है सुद-गोष्ठी इसी का नाम है। सुहृद-गोष्ठी की वातचीत की यह तारीफ़ है कि बात करनेबवालों की लियाकत अथवा पेडिताई का अभिसान या कपट कहीं एक बात में न्॒ प्रकट हो वरन्‌ क्रम रसाभास पेदा करनेवाले सभों को बरकते हुए चतुर सयाने अपनी बात्तचीत को अक्रम रखते हैं। वह हमारे आधुनिक शुष्क पंडितों की वातचीत में

है]

लेखलतिका

नीजीज्ल्लिजिजलञ जज जिजज *-ै जज जी - जज:

जल

न्ज्ज््््ज्न्ज्लि लि जज जज 5

जिसे शास्त्रा्थे कहते हैं, कभी आवेगा ही नहीं | मुर्ग और बटेर की लड़ाइयों की कपटा-कपटी के समान उनकी -नीरस काॉव-काव में सरस संज्ञाप की तो चच। ही चलाना व्यर्थ है, बरन्‌ कपट ओर एक-दूसरे को अपने पारिडत्य के प्रकाश से बाद में परास्त करने का संघ आदि रसाभास की सामग्री बहाँ बहुतायत के साथ आपको मिलेगी। घंटे भर तक काँव-काँव करते रहेंगे तो कुछ होगा बड़ी-बड़ी कंपनी और कारखाने आदि बड़े-से- बड़े काम इसी तरह पहले दो-चार दिली दोस्तों की बातचीत से ही शुरू किये गए। उपरांत बढ़ते-बढ़ते यहाँ तक बढ़े कि हज़ारों मनुष्यों की उनसे जीविका चलने लगी और साल में लाखों की आमदती होने लगी पच्चीस बषे के ऊपरबालों की बातचीत अवश्य ही छुछ-त-छुछ सारगर्सित होगी,-अनुभव ओर दूरदर्शिता से खाली होगी और पश्चीस से नीचे की बात- चीत सें यद्यपि अनुभव, दूरदर्शिता और गौरव नहीं पाया जाता पर इसमें एक प्रकार का ऐसा दिलबहलाव और ताज़गी रहती है जिसकी मिठास उससे दस गुना चढ़ी-बढ़ो है। यहाँ तक हमने बाहरी बातचीत का हाल लिखा है जिसमें दूसरे फ़रीक* के होने की बहुत आवश्यकता .है, घिना किसी दूसरे मनुष्य के हुए ज्ञो किसी तरह संभव नहीं है ओर जो दो ही तरह पर हो सकती है--या.तो कोई हमारे यहाँ कृरा करे या हसीं जाकर दूसरे को कताश् करें | पेर यह सब तो दुनिया- दारी है जिसमें कभी-कमी रसाभास होते देर नहीं छगत्ती क्योंकि जो महाशय अपने यहाँ पथारें उनकी पूरी, दिलजोई से हो सकी तो शिप्राचार में त्रुटि हई। अगर हमीं उनके वहाँ गये तो पहले तो बिना बुलाये जाना ही अनादर का मूल हे ओर जाने पर अपने मन-माफ़िक बर्ताव किया गया तो भानों एक दूसरे प्रकार का नया घाव हुआ | इसलिए सबसे

महात्मा गांधी की आत्मकथा

ऑल जी 33 तल तल: प्न्लीजी लंड जज लि जल जल हज जी 3 जी टी न्‍ ता + <

उत्तम प्रकार बातचीत करने का हम यही सममभते हैं कि हम वह शक्ति अपने में पेदा कर सके कि अपने आप बात कर लिया करें हमारी भीतरी मनोवृत्ति जो प्रतिक्षण नये-नये रंग दिखाया करतो है, वह प्रपंचात्मक संसार का एक बड़ा भारी आईना है

जिसमें जैसी चाहो बेसी सूरत देख लेना कुछ दुघट बात नहीं है. ओर जो एक ऐसा चमनिस्तान है जिसमें हर किस्म के वेल-बूटे खिले हुए हैं ऐसे चमनिस्तान की सैर में क्या कम दिलवहलाव है? मित्रों का प्रेमालाप कभी इसकी सोंलहवीं कल्ला तक भी पहुँच सका इसी सेर का नाम ध्यान या मनोयोग या चित्त को एकाम्र करना है जिसका साधन एक-दो दिन का काम नहीं, बरसों के अभ्यास के उपरांत यदि हम थोड़ी भी अपनी मनो- वृत्ति स्थिर कर, अवाक्‌ हो, अपने मल के साथ बातचीत कर सके तो सानो अहोभाग्य एक याक-शक्तिमान्र के दमन से जाने कितने प्रकार का दमन हो गया हमारी जिह्ा कतरनी* के समान सदा स्वच्छंद चला करती है, उसे यदि हमने दबाकर काबू सें कर लिया तो क्रोधादिक बड़े अजेय शत्रुओं को बिना प्रयास जीत अपने चश कर डाला | इसलिए अवाक्‌' रह अपने आप बातचीत करने का यह साधन यावत्‌ साधनों .का मल है, शान्ति. का परम पूज्य मन्दिर है, परमार्थ का एकमात्र

सोपान है |

महात्मा गांधी की आत्कृथा... ( अनु. श्री सहादेव देसाई तथा हरिभाऊ पाध्याय )

(१) स्कूल में पोरवन्द्र से पित्ता जी राजस्थानिक कोर्ट! के सदस्य होकर

लेखलतिका

आन आओ था कक

जब राजकोट गये तब मेरी उम्र कोई सात साल की होगी। राजकोट की देहाती पाठशाला में ' में भरती कराया गया | उन दिनों का मुझे भत्ती-भान्ति स्मरण है। सास्टरों के नाम-धाम भी याद हैं। पोरबन्दर की तरह वहां की. पढ़ाई के सम्बन्ध में कोई खास बात जातने लायक नहीं। भेरी गिनती साधारण श्रेणी के विद्यार्थियों में रही होगी। पाठशाला के ऊपर के स्कूल में और वहां से. हाईस्कूल तक पहुँचने में मेरा बारहवां वर्ष बीत गया। तब तक मैंने कभी शिक्षक आदि से भूठ बोला हो, ऐसा याद नहीं पड़ता | किसी को दोस्त बनाने का स्मरण है। में बहुत संकोची* लड़का था; मदरसे में अपने काम से काम रखता | घंटी बजते-बजते पहुँच जाता और स्कूल बन्द होते ही घर भाग आता | भाग आता? शब्द का प्रयोग जान बूकत कर किया हे; क्‍योंकि सुझे किसी के साथ बातें. करना नहीं रुचता था--मुझे यह डर भी बना रहता था कि कोई मेरा मज़ाक डड़ावे। |

हाइस्कूल के पहले ही वर्ष की परीक्षा के समय की एक घटना उल्लेखनीय* हे। शिक्षा-विभाग के इंस्पेक्टर, जाइल्‍स साहब, मुआइने* के लिए आये। उन्होंने पहले द्रजे* के विद्या- ध्ियों को पांच ' शब्द लिखवाये | उनमें एक शब्द था--केटल? (/(०८८७) | उसके हिज्जे मेंने ग़लत लिखे। मास्टर ने मुमे अपने बृट से ठोकर देकर चेताया; पर में कहां सममने वाला था ? मेर दिसाग में यह बात नहीं आई कि मास्टर साहव मुझे सामने के लड़के की स्लेट देखकर हिजजे दुरुस्त करने का इशारा कर रहे हैं। मैंने यह मान रखा था कि मास्टर तो इसलिए तनात हैं कि कोई लड़का दूसरे की नकल कर सके | सच लड़कों के पांचों शब्द सह्दी निकले, अकेला में ही वेवकूक बच गया। मेरी बेबकूफी बाद को सास्टर ने ब्तलाई | पर भेरे मन

जज

महात्मा गांधी की आत्मकथा

तीस + न्‍ी सजी:

पर उस का कोई असर हुआ मुझे दूसरे लड़कों- से नकल करना कभी आया। कि कि हक

ऐसा होते हुए भी मास्टर साहब के प्रति मेरा आदर कभी न.घटा | बूढ़ों के दोष देखने का गुण मुझ में स्वाभाविक था। बाद को तो इन मास्टर साहब के दूसरे दोष भी मेरी नज़र में आये | फिर भी उनके प्रति मेरा आदर ज्यी-कां-त्यों कायम” रहा। में इतना जानता था कि बड़े-बूढ़ों की आज्ञा का पालन करना चाहिए, जो वे कहें करना चाहिए, वे जो. कुछ करें, उसका काज़ी* हमें बनना चाहिए गम

इसी बीच दूसरी दो घटनाएँ हुईं, जो मुझे सदा याद रंही- हैं। मामूली तौर पर मुझे कोर्स की पुस्तकों के अलावो कुछ भी पढ़ने का शौक था। सबके पूरा करना चाहिए, डाट सही नहीं जाती थी, सास्टर से छल-कपट करना नहीं था, इन कारणों से में सबक पढ़ता, पर सन लगा करता इससे सबक बहुत बार कच्चा रह जाता ऐसी हालत में दूसरी पुस्तक पढ़ने को जी केसे चाहता परन्तु पिता जी की खरीदी एक पुस्तक श्रवण-पितृ-सक्ति” नाटक पर मेरी नज़र पड़ी। इसे पढ़ने को दिल चाहा बड़े अनुराग और चाव से मेंने उसे पढ़ा इन्हीं दिनों काठ: के बकस सें शीशों से तस्वीर दिखाने वाले भी फिरा करते। उनमें मेंने श्रवण का अपने माता-पिता को कांवर* में वेठा कर यात्रा.के लिए लेजाने वाला चित्र देखा दोनों चीज़ों का मुझ पर गहरा असर पड़ा। मन सें श्रवण के समान होने के विचार उठते | श्रवण की सृत्यु पर उसके साता- पिता का विलाप मुझे अब भी याद है। उस ललित छन्द को मैंने वजानां सीख लिया था। मुझे वाजा सीखने का शौक था ओर पिता जी ने एक वाजा ला मी दिया था

इसी समय कोई नाटक-कंपनी आई और

१० लेखलतिका

बल्ड्ड्डजजल शी जज जाली जन्‍्जि््िज्ज्््ज्जज्ककिल्कतकतजज जल जज जज जी सी लत -ल तट जलती डा

नाटक देखने .की छुट्टी मिली | इसमें हरिश्रन्द्र की कथा थी। यह नाटक देखने से मेरी .ठृप्ति नहीं होती थी। बार-बार उसे देखने को मन हुआ करता, पर बार-बार जाने कौन देता पर अपने मन में मैंने हरिश्वन्द्र का नाटक सेंकड़ों बार खेला होगा। हरिश्वन्द्र के सपने आया करते | यही घुन लगी कि हरिश्रन्द्र की तरह सत्यवादी सच क्‍यों हों ? यही धारणा* होती कि हरिश्वन्द्र के जैसी विपत्तियां भोगना और सत्य का पालन करना ही सच्चा सत्य है। मेंने तो यही मान रखा था कि नाटक भें जेसी विपत्तियां हरिश्वन्द्र पर पड़ी हैं, वेसी ही वास्तव में उस पर पड़ी होंगी। हरिस्न॑न्द्र के दु:खों को देख कर और उन्हें याद करके में खूब रोया हूँ।आज मेरी बुद्धि कहती है कि संभव है, हरिश्वन्द्र कोई ऐतिहासिक" व्यक्ति हो, पर मेरे में तो हरिश्वन्द्र और श्रवण आज्ञ भी जीवित हैं मानता हूँ कि आज भी यदि में उन नाटकों को पढ़ँ तो आँसू आये बिना रहें | हि (२) हाई स्कूल में जब मेरा विवाह हुआ तब में हाई स्कूल में पढ़ता था। स्कूल में में मन्द-बुद्धि विद्यार्थी नहीं माना जाता था। शिक्षकों का प्रेम तो मैंने सदा प्राप्त किया था। हर साल माता- पिता को विद्यार्थी की पढ़ाई तथा चाल-चलन के सम्बन्ध में प्रमाणपत्र भेजे जाते थे। इनमें किसी दिन मेरी पढ़ाई था चाल-चलन की शिकायत नहीं की गई। दसरे दरजे के वाद इनाम भी पाये ओर पांचवें तथा छठे दरजे में तो ऋमशः ४) आर १०) मासिक वी छात्रबूत्तियां* भी मिली थीं। इस सफलता में मेरी योग्यता की अपेक्षा भाग्य का ज्यादा जोर था।ये छात्रवृत्तियां सच लड़का के लिए नहीं, सौराष्ट्र प्रान्त* -के वद्याथियों के ही लिए थीं और उस समय चालीस-पचास

भहात्मा गांधी को आत्मकथा १९

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विद्यार्थियों के दरजे में सोराष्ट्र काठियाबाड़ के विद्यार्थी हो ही कितने सकते थे ९:

_. मेरी याद के अनुसार अपनी होशियारी पर *मुझे नाज नथा। इनाम अथवा छात्र-बृत्ति मिलती तो मुझे आश्रय होता; परन्तु हां, अपने चरित्र का मुझे बढ़ा खयाल रहता था। सदाचार में यदि चूक होती तो मुझे. रुलाई आजाती। यह मेरे लिए बर्दाश्त से बाहर था कि मेरे. हाथों कोई णेसी बात हो कि शिक्षक की शिकायत केा मौका मिले या वह सन में भी ऐसा सोचे मुझे याद है कि एक बार मार खानी पढ़ी थी; उसमें मार खाने का तो दुःख था, पर इस बात का बड़ा पछतावा था कि में दंड का पात्र* सममा गया में खूब रोया | यह घटना पहले या दूसरे दरजे की है दूसरा प्रसंग सातवें दरजे का है।उस समय दोराबजी एदलजी गीमी हेडमास्टर थे। वह कड़ा अनुशासन" रखते थे, फिर भी विद्या- थ्ियों में प्रिय थे। वह वाकायदा काम करते और काम लेते, ओर पढ़ाते भी अच्छा थे | उन्होंने ऊँचे दरजे के विद्यार्थियों के ' लिए कसरंत,* क्रिकेट, अनिवाये” कर दी थी.। सेरा सन उससें लगता था। अनिवाय होने के पहले तो में कसरत, क्रिकेट या पुटवाल में कभी जाता ही न. था। जाने में सेरा संकोची स्वभाव भी एक कारण था। अब में देखता हूँ.कि कसरत की यह्‌ अरुचि सेरी भूल थी | उस समय मेरे ऐसे रालत विचार थे कि कसरत का शिक्षा के साथ कोई सम्बन्ध नहीं बाद में समझ में आया कि विद्याभ्यास में व्यायाम का अरथात्‌ शारीरिक शिक्षा का मानसिक शिक्षा के समान ही स्थान होना चाहिए। फिर भी सें कहना चाहता हूँ कि कसरत में जाने से हानि हुईं कारण, मैंने पुरतकों में खुली हवा में धूमने की सिक्का रिश पढ़ी थी। यह मुझे पसंद आई और तभी से घूमने जाने

श्र्‌ लेखलतिका

की आदत मुझे पड़ गई, जो अब तक है | घूमना सी व्यायाम तो है ही; और इससे मेरा शरीर ठीक-ठीक गठीला हो गया। व्यायाम की जगह घूमना जारी रखने की वजह से शरीर से कसरत करने की भूल के लिए तो भुझे सजा नहीं- सोगनी पड़ी, पर दूसरी एक भूल की सज़ा में आज तक भोग रहा हूँ। पता नहीं कहां से, यह ग़लत खयाल मुझे मिल गया था कि पढ़ाई में सुलेख* की ज़रूरत नहीं है। यह विलायत जाने तक बना रहा। बाद में तो में पछताया और शरमाया | मैंने सममा कि अक्षरों का खराब होना अधूरी शिक्षा की निशानी है। अतः हरेक नवयुवक ओर युवती सेरे इस उदाहरण से सबक ले और सममे कि-सुन्दर अक्षर शिक्षा का आवश्यक अंग हैं इस समय के मेरे विद्यार्थी-जीवन की दो बातें लिखने-जेसी हैं। चौथे दरजे से कुछ विषयों की शिक्षा अंग्रेजी में दी जाती थी, पर में कुछ समझ ही नहीं पाता था। रेखागणित में मैं यों भी पीछे था, ओर फिर अंग्रेजी में पढ़ाये जाने के कारण और भी समम में आता था | शिक्षक सममाते तो अच्छा थे; पर मेरी समझ में आता था। में बहुत बार निराश हो जाता परिश्रम करते-करते जब रेखागणित्त की तेरहवीं शक्त पहुँची, तब सुझे एकाएक लगा कि रेखागणित तो सब से आसान विपय है ।जिस बात में केवल बुद्धि का सीधा और सरल प्रयोग ही करना है उसमें मुश्किल क्‍या है उसके बाद से रगखागणित मेरे लिए सहज और मज़ेदार विपय हो गया। संस्कृत मुझे रेखागणित से भी अधिक मुश्किल मालूम पढ़ी रेखागशित में तो रटने की कोई बात थी, परन्तु संम्कृत में मेरी दृष्टि से अधिक काम रठटने का ही था। यह विपय भी चौथी कक्षा से शुरू होता था। छटी कक्ता में ज्ञाकर ते मेरा दिल चैंठ गया। संम्कृत-शिक्षक बड़े सख्त थे | विद्या-

आम

महात्मा गांधी की आत्मकथा श्३्‌

आज भी

्थियों को बहुतेरा पढ़ा देने का उन्हें लोभ था। संस्कृत ओरं फ्रारसी के दरजे में एक प्रकार की होड़-सी* लगी रहती थी। फ़ारसी के मौलवी साहब नरम्त आदमी थे। विद्यार्थी आपस में बातें करते कि फ़ारसी तो बहुत सरल है, फ्रारसी के अध्यापक भी बड़े मुलायम हैं विद्यार्थी जितना काम कर लाते हैं, उतने से ही वे निभा लेते हैं सहज होने की बात से में भी ललचाया और एक दिन फ़ारसी के दरजे में जाकर -बेठा। संस्कृत-शिक्षक को इससे दुःख हुआ और उन्होंने मुझे बुलाकरं कहा--तुम सोचो तो कि तुस किस के लड़के हो ? अपनी धार्मिक भाषा सीखोगे ? अपनी कठिनाई मुझे बताओ मेरी तो इच्छा रहती है कि सब विद्यार्थी अच्छी संस्कृत - सीखें। आगे चल कर उससें रस-ही-रस मिलेगा | तुम को इस- तरह निराशं होना चाहिए ।.तुम फिर मेरे दरजे में आजाओ”?

- में शरमाया | शिक्षक के श्रेम की अवहेलना* कर सका। आज मेरी आत्मा कृष्णशह्भुर . पर्ड्या की कृतज्ञ है, क्योंकि जितनी संस्कृत मेंने उस समय पढ़ी थी, यदि उतनी भी पढ़ा होता तो आज में संस्कृत शास्त्रों का जो रसास्वादन कर पाता हूँ बह कर पाता बल्कि अधिक संस्कृत पढ़ सका, इसका पछतावा होता है। क्‍योंकि आगे चल कर मैंने समझा कि किसी भी हिन्दू-बालक को संस्कृत के अध्ययन" से वंचित नहीं रहना चाहिए। पक,

अब तो में यह मानता हूँ कि भारतवर्ष के उच्च शिक्षण- क्रम में अपनी भाषा के अलावा राष्ट्रभाषा हिन्दी, संस्कृत, फ़ारसी, अरबी और अंग्रेज़ी को सथाव मिलना चाहिए इतनी भाषाओं को शिचती से किसी को धवराने की ज़रूरत नहीं | यदि भाषाएँ ढंग से सिखाई जायें और सब विषय अंग्रेज़ी रे द्वारा ही पढ़ने, समभने का वोफ हम पर हो तो उपयुक्त* भाषाओं

श्द लेखलतिका

तरह विक्ृत साहित्य से मस्तिष्क भी विकारप्रस्त* होकर रोगी हो जाता है। मस्तिष्क का बलवान्‌ और शक्तिसंपन्न होना अच्छे ही साहित्य पर अवलंबित है अतएव यह बात निश्चान्त है कि मस्तिष्क के यथेष्ट विकास का एकमात्र साधन अच्छा साहित्य है। यदि हमें जीवित रहना है और सभ्यता की दौड़ में अन्य जातियों की बराबरी करना है तो हमें श्रम- पूवेक, बढ़े उत्साह से, साहित्य का उत्पादन और प्राचीन साहित्य की रक्षा करनी चाहिए।और यदि हमे अपने मानसिक जीवन की हत्या करके अपनी वतेमान दयनीयं दशा में पड़ा रहना ही अच्छा समझते हों तो आज ही साहित्य- निर्माण के आडम्वर का विसजन* कर डालना चाहिए |

- आँख उठाकर ज़रा और देशों तथा जातियों की ओर तो देखिए आप देखेंगे कि साहित्य ने वहाँ की सामाजिक और * राजकीय स्थितियों में कैसे-कैसे परिवर्तन कर डाले हैं | साहिल्य ने वहाँ समाज की दशा कुछ-की-छुछ कर दी है; शासन-प्रवंध में बड़े-बड़े उधल-पुथल कर डाले हैं; यहाँ तक कि अजुदार ओर धार्मिक भावों को भी जड़ से उखाड़ फेंका है| साहित्य में जो शक्ति छिपी रहती है, बह तोप, तलवार और बम के गोलों में भी नहीं पाई जाती योरुप में हानिकारिणी धार्मिक रूढ़ियों का उत्पाटन साहित्य ही ने किया है। जातीय स्वातंत्रय के बीज उसी ने थोए हैं| व्यक्तिगत स्वातंत्य के भाषों को भी उसी ने पाला, पोसा ओर बढ़ाया हैँ पतित देशों का पुनरुत्थान भी उसी ने किया हैं| पोप की प्रभुता* को किसने कम किया हैं ? फ्रांस में प्रजा की सत्ता* का उत्पादन ओर उन्नयन किसने किया १९ पादाक्रान्त इटली का मस्तक किसने ऊँचा उठाया है ? साहित्य न, साहित्य ने, साहित्य ने जिस साहित्य में इतनी शक्ति है, जो सादिस्य सुर्दो को भी झिंदा करन बाली संजीवनी

सन्‍जे |, मसल्‍सनथन नरन पर जमजनानासनी अर जन मकर चलन जी - ले ज- के

साहित्य की महत्ता श्७

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ओषधि का आकर है, जो-साहित्य पतितों को उठाने वाला और उत्थितों के मस्तक को उन्नत करने वाला है उसके उत्पादन और संवर्धन की चेष्टा जो जाति नहीं करती वह अज्ञानान्धकार के गते में पड़ी रहकर किसी दिन अपना अस्तित्व ही खो बेठती हैं। अतएव समर्थ होकर भी. जो मनुष्य इतने महत्वशाली साहित्य की सेवा और अभिवृद्धि नहीं करता अथवा उससे . अनुराग नहीं रखता वह समाजद्रोही है, वह देशद्रोही है, वह जातिद्रोही है, कि बहनी, बह आत्मद्रोही और आत्महंता भी है। कभी-कभी कोई समृद्ध भापा अपने ऐश्वयं के बल पर दूसरी भाषाओं पर अपना अ्भुत्व स्थापित कर लेती है, जेसे जमनी, रूस और इटली आदि देशों की भाषाओं पर फ्रेंच साषा ने बहुत समय तक कर लिया था। स्वयं अंग्रेज़ी भाषा भी फ्रेंच और लेटिन भाषाओं के दवाव से नहीं बच सकी कभी- कभी यह दशा राजनैतिक प्रभुत्व के कारण भी. उपस्थित.हो जाती है और विजित देशों की भाषाओं को जेता जाति .की भाषा दवा लेती है तब उसके साहित्य का उत्पादन यदि बंद नहीं हो जाता तोः उसकी वृद्धि की गति मन्द ज़रूर पड़ जाती है। यह अस्वाभाविक दबाव सदा नहीं बना रहता इस प्रकार की दवी या अधःपतित भाषाएँ चोलने वाले जब होश में आते हैं तब वे इस अनैसर्गिक आच्छादन* को दूर फेंक देते हैं जमेती, रूस, इटली और स्वयं इद्ललैणड चिरकाल- तक फ्रोंच और लेटिन भाषाओं के माया-जाल में फँसे थे। पर बहुत समय हुआ, उस जाल को .उन्‍्होंने. तोड़ डाला। अब वे अपनी ही भाषा के साहित्य की अभिवृद्धि करते हैं, कभी भूलकर भी विदेशी भाषाओं में अ्न्थ-रचना करने का विचार नहीं करते। बात यह है कि अपनी भाषा का साहित्य ही जाति और स्वदेश की उन्नति का साधक है। विदेशी भाषा का चूड़ांत ज्ञान

२० लेखलतिका

जानवरों में मानसिक व्यापार के कोई चिन्ह नहीं देख पड़ते। किसी आंतरिक प्रवृत्ति, उत्तेजना या शक्ति की प्रेरणा से ही थे सब शारीरिक व्यापार करते है किसी मतलव से कोई काम करना बिना ज्ञान के--विना बुद्धि के--नहीं हो सकता | ज्ञान दो तरह का है--स्वामाबिक" और उपा्जित ।* स्वाभाविक -पशुओं में और उपार्जित मनुष्यों में होता है हम सब काम सोच-समम कर जैसा करते हैं, जानवर बेसा नहीं करते | उनमें घिचार-शक्ति ही नहीं है; उनके सन में विचारों के रहने की जगह ही नहीं; क्योंकि थे वोल नहीं सकते | ठीक-ठीक विचारणा या भावना बिना भाषा के नहीं हो सकती | भाषा ही विचार की जननी है। भाषा ही से विचार पेदा होते हैं।बाणी और अर्थ का योग सिद्ध ही है। शब्दों से अथे था विचार उसी तरह अलग नहीं हो सकते, जैसे पदार्थों के आकार उनसे अलग नहीं हो सकते | जहां आकार देख पड़ता/ है, वहां पदार्थ ज़रूर होता है। जहाँ विचार होता है, वहाँ भाषा ज़रूर होती है| बिना भाषा के विपय-क्षान और विपय-प्रवृत्ति इत्यादि-इत्यादि बातें हो सकती हैं, परन्तु बिचार नहीं हो सकता। पशु अपनी इंद्रियों की सहायता से ही पदार्थों का ज्ञान प्राप्त करते हैं।जो पदार्थ समय ओर आकाश में विद्यमान रहते हें, सिफ्रे उन का ज्ञान पशुओं को इन्द्रियों से होता है, और पदार्थों का नहीं | पशुओं में स्मरण-शक्ति नहीं होती, पुरानी बातें उन्हें याद नहीं रहती। यही पुर्बाक्त साहब का मत है इनमें से बहुत-सी बातों का खंडन हो सकता है | कुछ का

ग्यंडन लोगों ने किया भी हैं। विचार क्या चीज़ है ? सोचना

कसे कहते हैं ? सिर में एक प्रकार के ज्ञान-तंत हैं। बाहरी जगत की किसी चीज़ या शक्ति का पअवतिबिंब-रूपी ठप्पा, ज्ञो उन नंतुझं पर उठ आता हैं, उसी का नाम विचार | जितने

कया जानवर भी सोचते हैं २९

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प्रकार के शब्द सुन पड़ते हैं, उनकी तसबीर सिर के भीतर तंतुओं पर खिंच-सी जाती है।यह तसबवीर मिटाए नहीं मिटती | कारण उपस्थित होते ही वंह नई होकर ज्ञान-आहिका शक्ति के सामने जाती है। यह कहना गलत है. कि बिना भाषा के विचार नहीं हो सकता। जो लोग ऐसा कहते हैं, थे शायद उन शब्द-समूहों को भोषा कहते हैं जो वर्ण-रूपी चिह्नों से बने हैं पर क्या कोई इंजीनियर या मिस्त्री एक बड़े-से-बड़े सकान या मीनार की कल्पना, बिना ईंट, पत्थर और चुने इत्यादि का नाम लिये सी, नहीं कर सकता ? क्‍या ज्यामिति- शास्त्र* के पंडित को अपना मतलब सिद्ध करने के लिए वर्ण- रूपिणी सापा की कुछ भी जरूरत पड़ती है? अथवा क्‍या बहरे और गूगे आदसी ज्ञान-तंतुओं पर चित्रित चित्रों की सहायदा से भावना, कल्पना, विचार था स्मरण नहीं करते ?

फिर दिचार की बड़ी ज़रूरत भी नहीं देख पड़ती कया बिना विचारणा के काम नहीं चल सकता ? सच पृछिए, तो जगत्‌ में बहुत कम विचारणा होती है। हरबटो स्पेंसर तक के बड़े-बड़े ग्रंथ विचारणा के बल पर नहीं लिखे गये। स्पेंसर ने अपने आत्म-चरित में ऐसा ही लिखा है। उसका कथन है कि सेने उन्हें अपनी प्रतिभा के बल से लिखा है। मेरे मन में आप- ही-आप उनको लिखने की इच्छा उत्पन्न हुई। उसी ने मुझसे लिखाया | दुनियां में जितने बड़े-बड़े प्रंथ देख पड़ते हैं, उनमें बहुत-से ऐसे हैं, जिनको उनके लिखने वालों ने अपने मस्तिष्क >अपने मन, अपनी प्रतिभा की प्रेरणा से ही लिखा है जिस तरह, भेदे के द्वारा पाचन-क्रिया होने से खून और पित्त पेदा होता है जिंस तरह प्रजोत्पादक अंगों के द्वारा प्रजा की उत्पत्ति होती है उसी तरद् बड़े-बड़े आदमियों के प्रतिभा-पूर्ण मस्तकों से कविता किताबें और इयारतों की कल्पनाएँ निकलती हैं।

मर: * लेखलतिका कालिदास ने रघुवंश लिखा और भवभूति ने उत्तरराम- चरित | पर किस तरह उनके सन में इनको लिखने की बात आई आप-ही-आप | विचार करने की ज़रूरत नहीं. पड़ी पहले-पहल उनके सस्तिष्क में इसको लिखने की इच्छा: स्वतः संभूत" हुईं | संसार में एक भी मनुष्य ऐसा नहीं हुआ, जिसने, अपनी इच्छा से कोई ऐसा काम किया हो, जिसका या जिस की सामग्री का अस्तित्व पहले ही से विद्यमान रहा हो यदि कोई जानवर कोई काम किसी इरादे से करे, और जिस ज्ञानात्मिका बुद्धि से वह इरादा पेंदा हुआ हो, वह बुद्धि स्वाभाविक हो तो उससे कया उससे कोई नया सिद्धांत नहीं निकलता चाहे वह स्वाभाविक हो, चाहे उपार्जित--बात वही रहती है उससे ज्ञान का होना--चुद्धि का होना--नहीं साबित होता। ज्ञान चाहे जिस प्रकार का हो, वह है तो | ताजमहल की कल्पना करनेवाले में भी ज्ञान था, और घोंसला या ग़ार वनानेवाले जीयों में भो वह है | किसी में कम, किसी ज्यादा | मकड़ी, चिड़ियाँ, लोमड़ी और चींटी इत्यादि छोटे- दे जीब तक अपने-अपने काम से ज्ञान रखने का प्रमाण देते अर ज्ञान मन का ज्यापार है | मन से ज्ञान का तब्रह्दत बडा सम्बन्ध है तो फिर यह कैसे कह सकते हैं कि जानवरों में मानसिक विचार की शक्ति नहीं हैं.

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जो कुछ हम सोचने या करते हैं, वह इंद्रियों पर उठे हुए सित्र का कारण नहीं हैं | उसका कारण ज्ञान है। एक किताब या कुर्सी की तसवीर मकाबद्ी की इन्द्रियों पर भी बेसी ही खियगी, जैसी पालने पर पढ़े हुए छोटे बालक की इन्द्रियों 7 पर झिसमें जितना ज्ञान होना है, जिसमें जितनी बद्धि छोती ४, उसी के अनुसार सांसारिक पदार्था था शक्तियों की शानगन मूर्तियों का महत्व, न्‍्यूनाधिक भाव में, सब्र कहीं देख

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कर्तेघ्य ओर सत्यता श्३्‌

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पढ़ता है। जिस भाव से हम एक किताब को देखेंगे, मेंस उस भाव से उसे देखेगी पर देखेगी ज़रूर, और उसका चित्र भी उसकी ज्ञानेंद्रियों पर ठीक वेसा ही उतरेगा, जेसा आदमियों की इन्द्रियों पर उतरता है

इसमें संदेह. नहीं कि सोचना या विचार करना--चाहे वह ज्ञानात्मक हो, चाहे हो--मस्तिष्क की क्रिया है। अतएव उसका संबंध मन से हे ।और, आदमी से लेकर चींटी तक, सब जीवधारियों में, अपनी-अपनी स्थिति और आवश्यकता के अनुसार, मन होता है यह नहीं कि किसी में वह बिल्कुल ही होता हो इस से यह सिद्ध है कि ज्ञिस सिद्धांत का उल्लेख ऊपर हुआ, वह ठीक नहीं

न्‍अनानतेलनीयन-क-ममननया+ अननननना का,

कतंव्य और सलता

( श्री डा० श्यामसुन्दरदास )

फतेव्य चह वस्तु है जिसे करना हम ल्लोगों का परम धर्म है ओर जिस के करने से हम लोग और लोगों की दृष्टि से गिर जाते हैं ओर अपने कुचरित्र से नीच बन जाते हैं। प्रारंसिक अवस्था में कतेव्य का करना बिना दवाब से नहीं हो सकता, क्योंकि पहले-पहल मन आप ही उसे करना नहीं चाहता इसका आरंभ पहले घर से ही होता है; क्योंकि यहाँ लड़कों का कर्तेन्य माता-पिता की ओर और माता-पिता का कतेंव्य लड़कों की ओर देख पड़ता है। इसके अतिरिक्त पति-पत्नी, स्वामी-सेवक और स्त्री-पुरुष के भी परस्पर अनेक कतेव्य हैं।घर के बाहर हम मित्रों, पड़ोसियों, और राजा-प्रजाओं के परस्पर कतेव्यों को देखते हैं। इसलिए संसार में सनुप्य का जीवन कर्तव्यों से

२४ लेखलतिका

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भरा पड़ा है, जिधर देखो उधर कततेव्य ही कर्तव्य देख पड़ते हैं। बस इसी कतेव्य का पूरा-पूरा पालन करना हम: लोगों दी धर्म है, और इसी से हम लोगों के चरित्र की शोभा बढ़ती है | कतेव्य का करना न्याय पर निर्भर है और बह न्याग्र ऐसा है जिसे समझने पर हम लोग प्रेम के साथ उसे कर सकते हैं )

हम सब लोगों के सन में एक ऐसी शक्ति है जो हम सभी

को बुरे कामों के करने से रोकठती और अच्छे कामों की ओर हसारी प्रवृत्ति को कुक्ाती है यह वहुधा देखा गया है कि जब कोई मनुष्य खोटा काम करता है तथ बिना किसी के कहे आप ही लज्ञाता और अपने मन में दु:ली होता है.। लड़को ! तुमने बहुधा देखा होगा कि जब कभी कोई लड़का किसी मिठाई को चुराकर खा लेता है तब वह मन में डरा करता है. और पीछे से आप ही पछताता है कि में ने ऐेसा काम क्‍यों किया, मुझे खपनी मात्ता से कह कर खाना था। इसी प्रकार का एक दूसरा लड़का, जो कभी कुछ चुरा कर नहीं खाता, मदा पसन्न रहता क्र उसके सन में कसी क्रिसी प्रकार का डर और पछतावा नहीं होता इसका क्‍या कारण है यही कि हम लोगों का यह कर्तव्य है कि हम कभी चोरी करें | परन्त जब हम चोरी कर अगते है तथ हमारी आत्मा हमें कोसने लगती है| इसलिए हमारा यह धर्म कि हमारी आत्मा हसें जो कहे, उसके अनुसार हम करे टद विश्वास रस्बे। कि जब तम्हारा मस क्रिसी काम के करने से दिचकिचाय और दूर भागे तब कभी तुम इस काम की करो। तुम्हें अपना घर्म-्पालन करने में बरहुमा कष्ट उठाना पढ़ेगा, पर इससे तुम साहस छोड़ो | क्‍या हुआ जो मुम्दारे पीसी ठझाविया ओर असलस्यपरता* से घनादय हे। गये ओर लुम कंगाल ही रह गये | क्या हत्या जो दसरे लोगों ने झुडी सादुफारी करके बदी-बदी नोकरियों पा लीं ओर सम्टें

कतेव्य और सत्यता र््‌ध्‌

्न्ल्ज््ज्जजजजि जज जी जज जज जी + ्ीलीजल किक खली खप्च्प्च्चख्ख्खज््ख्ख्््च्खच्चिजि जज

कुछ मिला और क्या हुआ जो दूसरे नीच कम करके सुख भोगते हैं और तुम सदा कष्ट में रहते हो | तुम अपने कतेज्य- धर्म को कभी छोड़ो और देखो इससे बढ़कर संतोष और आदर क्या हो सकता है कि तुम अपने धर्म का पालन कर सकते हो

हम लोगों का जीवन सदा अनेक कार्यों से व्यग्र* रहता है। हम लोगों को सदा काम करते ही बीतता है | इस लिए हस लोगों को इस बात का पूरा ध्यान रखना चाहिए कि हम लोग सदा अपने घमम के अनुसार काम करें और कभी इसके पथ पर से हटें, चाहे उसके करने में हमारे प्राण भी चले जायाँ तो कोई चिंता नहीं

धर्म-पालन करने के मार्ग में सब से अधिक बाधा चित्त की चंचलता, उद्देश्य की अस्थिरता और मन की निवलता से पड़ती है मलुष्य के कतेव्य-मार्ग में एक ओर तो आत्मा के भले और बुरे कार्मों का ज्ञान और दूसरी ओर आलस्य और स्वार्थपरता* रहती है | बस, मनुष्य इन्हीं दोनों के बीच में पड़ा रहता है| ओर अंत में यदि उस का मन पक्का हुआ तो वह आत्मा की आज्ञा मान कर अपने घर्म का पालन करता हैं और यदि डसका मन कुछ काल्ल तक द्विविधा* में पड़ा रहा तो स्वाथ परता निश्चय उसे घेरेगी और उसका चरित्र घृणा के योग्य हो जायगा | इसलिए यह बहुत आवश्यक है कि आत्मा जिस बात के करने की प्रव्॒त्ति दे उसे, विना अपना स्वार्थ सोचे, मटपट कर डालता चाहिए ऐसा करते-करते जब धर्म करने की वान पड़ जायगी तब फिर किसी बात का भय न॒रहेगा देखो, इस संसार में जितने बड़े-वड़े लोग हो गये हैं, जिन्होंने संसार का उपकार किया है और उसके लिए आदर और सत्कार पाया है, उन सभों ने अपने क्तेव्य को सब से श्रेष्ठ माना है, क्योंकि

र्६ लेखलतिका

जितने कर्म उन्होंने किये उन सभों में अपने कतेव्य पर ध्यान दे कर न्याय का वर्ताव किया | जिन जातियों सें यह गुण पाया जाता है वे ही संसार में उन्नति- करती हैं और संसार में उनका नाम आदर के साथ लिया जाता है। एक समय किसी अंग्रेज़ी जहाज में, जब वह बीच समुद्र में था, एक छेद हो गया। उस पर बहुत-सी स्त्रियाँ और पुरुष थे। उसके बचाने का पूरा-पूरा उद्योग किया गया, पर जब कोई उपाय सफल हुआ तब जितनी स्त्रियों उस पर थीं सब नावों पर चढ़ा कर विदा कर